เรื่องสยองขวัญ
ทุกเรื่องในที่แห่งนี้ล้วนมีคนเคยพบเจอมาจริง — หรือจินตนาการขึ้น — โดยใครสักคนที่ไม่ต่างจากคุณ
- เรื่องแต่ง
टीकमगढ़ के स्कूल की तख्ती तीन बार
पीपल की जड़ में एक तख्ती टिकी थी। लकड़ी की, कोने से थोड़ी झुलसी हुई, जैसे किसी ने चूल्हे के पास रख दी हो। स्कूल में तख्तियाँ अब कोई नहीं लाता, बच्चे मोबाइल पे फोटो खींच के होमवर्क कर लेते हैं। फिर भी…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
नरसिंहपुर हाईवे के ढाबे का सातवां नियम
नहीं, वो सियार नहीं था। ये पहले साफ़ कर दूं, क्योंकि मेरे मामा भी यही समझते हैं, और मैं उन्हें कभी टोकता नहीं। पर जो चीज़ मैंने ढाबे पर रहकर देखी, तीन साल रहा वहां... नहीं, ठीक से याद करूं तो ढाई साल…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
कानपुर की कमला दर्ज़ी और वो एक इंच
मैं आज तक किसी दर्ज़ी के पास दूसरी बार अकेले फिटिंग के लिए नहीं जाती। पहली बार जाओ, नाप दो, बात खत्म। दूसरी बार जाना पड़े तो साथ में कोई और लड़की ज़रूर हो, चाहे ननद हो या पड़ोस की छोरी। ये नियम मेरी…
0 ความคิดเห็น नहीं साहब, मैंने कोई चूड़ी नहीं तोड़ी। ये पहली बात साफ़ कर दूँ, क्योंकि आप जब से बैठे हैं, बार-बार यही पूछ रहे हैं। चूड़ी मैंने नहीं तोड़ी, वो तो उतरते वक़्त खुद टूट गई थी। बाकी जो कुछ हुआ, वो मेरा…
0 ความคิดเห็น- เรื่องแต่ง
इमलीपुरा में तेरहवीं की उन्नीसवीं पत्तल
मैं सुबह से पत्तल गिन रही थी, तेरहवीं के लिए, और तीन बार गिनती बिगाड़ चुकी थी। अठारह मेहमान थे, अठारह पत्तल, फिर भी मेरा हाथ हर बार उन्नीसवीं रख देता था अलग से, जैसे कोई और भी आने वाला हो। दिमाग असल…
0 ความคิดเห็น नहीं भाई, तेरह नहीं थे, चौदह थे। ये बात गुरुजी वाचमैन ने खुद बताई थी, बीड़ी सुलगाते हुए, गेट के उस टूटे स्टूल पर बैठकर, जिसका एक पाया ईंट के सहारे टिका था। मैं दमोह के आदर्श हॉस्टल में उनसे मिलने गया…
0 ความคิดเห็น- เรื่องแต่ง
चिंदवाड़ा की सराफा लाइन वाला दूध
आज सुबह मैं अपनी बेटी की चोटी बाँध रहा था और तीसरी बार रिबन उलटा बाँध दिया। वो चिल्लाई, पापा दर्द हो रहा है, और मुझे पता भी नहीं चला कब खोपड़ी में उँगली फँस गई। दिमाग उसी घर पर अटका था जो गली के…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
बरवानी मेले वाली मेहंदी
अरे रुक, यही तो मैं बता रही हूँ, सुन तो पूरी। हाँ वही मेहंदी वाली, कोने वाले स्टॉल की। याद है ना, जो पीपल के पास लगती थी हर साल मेले में, ठीक उसी पेड़ के नीचे जहां छोटू का चाचा हर साल गन्ने का जूस…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
सिवनी हाईवे पर वो चीज़ भूत नहीं थी
नहीं, वो भूत नहीं था। ये बात राजू अंकल ने पहले ही साफ़ कर दी थी, चाय का गिलास टेबल पे पटकते हुए। मैं सिवनी से नागपुर जाने वाली हाईवे के ढाबे पे रुका था, रात के करीब ग्यारह बजे होंगे, बस का इंतज़ार…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
छतरपुर वाले प्रोफेसर साहब का रेडियो
पहले लगा नल टपक रहा है। हमारे यहाँ पुराने घरों में यही होता है, रात को सन्नाटा हो तो हर बूंद ड्रम पे ऐसे बजती है जैसे कोई टिक-टिक कर रहा हो। मैं लेटा हुआ मोबाइल में लगा था, सोचा उठकर टोंटी बंद कर…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
लांजी चौकी की रात वाली एंट्री
रजिस्टर की बात बाद में, पहले लाश की बात। वैनगंगा में डूबा एक आदमी शाम को जाल में फंसा था, मछुआरों ने निकाला, कोई शिनाख्त नहीं हुई, तो हमारे यहाँ ले आए। पोस्टमार्टम वैन बालाघाट से सुबह आनी थी, रात भर…
0 ความคิดเห็น हमारे यहाँ एक ही नियम है, बाकी सब चलता है। सीट नंबर बत्तीस की टिकट कभी नहीं काटी जाती। चाहे बस खचाखच भरी हो, चाहे कोई खड़ा होकर पूरा रास्ता जाने को तैयार हो, रामलाल भैया उस सीट की तरफ़ इशारा भी नहीं…
0 ความคิดเห็น- เรื่องแต่ง
कटनी जंक्शन के वेटिंग रूम की थाली
नियम यह है: रात की आख़िरी ट्रेन के बाद हम वेटिंग रूम की खिड़की वाली मेज़ पर एक थाली रख देते हैं। कभी चखी नहीं जाती, कभी पूछा नहीं जाता किसके लिए है। बस रख दो, ढँक दो, ताला लगाकर घर चले जाओ। यह कटनी…
0 ความคิดเห็น मैं बर्तन माँज रही थी और तीसरी थाली अभी तक साबुन से भरी पड़ी थी, हाथ चल रहे थे पर दिमाग दरवाज़े पर अटका था। रात के साढ़े नौ बजे थे, खाना खत्म हुए बीस मिनट भी नहीं हुए थे — या शायद पंद्रह ही हुए थे,…
0 ความคิดเห็นदादी हर बार एक ही जगह से कहानी शुरू करती हैं — पानी की टंकी के पास वाले नल से। हम सब चारपाई पर बैठे रहते हैं, लाइट गई हुई होती है, और दादी की आवाज़ अंधेरे में वैसे ही चलती रहती है जैसे कोई पुरानी…
0 ความคิดเห็นहमने पहले ही रात को गिनती शुरू कर दी थी, पर तब तक हमें नहीं पता था कि किस चीज़ की गिनती हो रही है। निशा की शादी को तीन महीने हुए थे, या शायद साढ़े तीन, अम्मा को ठीक याद नहीं रहता ऐसी बातें। गर्मी में…
0 ความคิดเห็น- เรื่องแต่ง
इटारसी स्टेशन से आख़िरी ऑटो
रमेश की ऑटो की पिछली सीट पर एक पायल पड़ी थी। सोने जैसी चमक, घुंघरू नीचे की तरफ़ दबे हुए, जैसे किसी ने जानबूझकर उलटा रखा हो। हाथ बढ़ाकर छुआ तो घुंघरू नहीं बजे, एक भी नहीं। रमेश ने सोचा किसी सवारी की…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
सीढ़ी पर सिर्फ ऊपर जाने के निशान
मीरा ने सीढ़ी के तीसरे डंडे पर पानी की बूंद देखी, फिर चौथे पर, फिर पाँचवें पर। हर बूंद के इर्द-गिर्द साड़ी के पल्लू जैसा गीला घेरा था, पंजे का निशान साफ़, पर एड़ी का निशान कहीं नहीं। जैसे कोई सिर्फ…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
मुलताई हाईवे का ढाबा
सोनू ने ढाबे के आगे चूने की लाइन देखी और रुक गया। आधी अधूरी थी, दायीं तरफ़ तंदूर तक जाकर बीच में टूट गई थी, जैसे किसी ने बीच रास्ते में ही डिब्बा फेंक दिया हो। मालिक रामलाल सुबह ही निकल गए थे, बगल के…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
रस्सी हर सुबह गीली मिलती है
मैं हर सुबह पहला काम यही करता हूँ। नल खोलने से पहले, चाय की पतीली चढ़ाने से पहले, पिछवाड़े जाकर उस पुराने कुँए की रस्सी हाथ में लेता हूँ। गीली मिले तो उस दिन कुएँ की तरफ पीठ करके सोता हूँ, और शाम का…
0 ความคิดเห็น






