
मैं आज तक किसी दर्ज़ी के पास दूसरी बार अकेले फिटिंग के लिए नहीं जाती। पहली बार जाओ, नाप दो, बात खत्म। दूसरी बार जाना पड़े तो साथ में कोई और लड़की ज़रूर हो, चाहे ननद हो या पड़ोस की छोरी। ये नियम मेरी बड़ी मासी ने सिखाया था, बहुत पहले, जब मेरी अपनी शादी की तैयारी चल रही थी। वजह कभी नहीं बताई, बस इतना कहा, कर लो, बुरा क्या है।
वजह मुझे शादी से एक हफ़्ते पहले पता चली, रसोई में हल्दी का लेप बनाते वक़्त। मासी ने हाथ चलाते-चलाते कमला दर्ज़ी की बात छेड़ी, जैसे कोई पुरानी आदत हो।
ये कोलोनेलगंज की बात है, नब्बे के दशक के आस-पास, या शायद उससे थोड़ा पहले, मासी को खुद ठीक साल याद नहीं रहता। कमला बाई की दुकान गुरुद्वारे के पीछे वाली गली में थी, सिलाई मशीन की आवाज़ रात नौ बजे तक आती रहती थी। बगल में एक पंक्चर की दुकान भी थी, उसका मालिक हमेशा रेडियो बजाता रहता था, ये बात कहानी से कोई लेना-देना नहीं रखती पर मासी हर बार बताती थी। कमला बाई बहुत साफ़ काम करती थी, ब्लाउज़ ऐसा फिट देती थी कि लोग दूर-दूर से आते थे। पर एक बात सब जानते थे। कभी दूसरी बार मत जाना। पहली फिटिंग में ब्लाउज़ ठीक लगे तो उसी दिन ले आओ, टोकाटाकी मत करो।
मासी की सहेली रुक्मिणी की शादी तय हुई थी। ब्लाउज़ लेने गई अकेली, माप ठीक नहीं बैठा, कंधे पर ज़रा तंग था। कमला बाई ने कहा, कल आना, ठीक कर दूँगी, फिर से नाप लूँगी। रुक्मिणी दुबारा गई, अकेली, क्योंकि माँ उस दिन बाज़ार गई थी।
जब ब्लाउज़ वापस आया तो कंधा ठीक था। पर कमर पर एक इंच कम कर दिया गया था, बिना बताए। रुक्मिणी ने ध्यान नहीं दिया, इतनी बारीक चीज़ किसे दिखती है। शादी वाले दिन ब्लाउज़ पहना, साँस लेने में थोड़ी तकलीफ़ हुई। सबने कहा नर्वस है, ऐसा होता है।
तकलीफ़ गई नहीं। महीनों बाद भी नहीं गई। रुक्मिणी की साँस धीरे-धीरे छोटी होती गई, जैसे कोई उसकी हवा किसी और जगह पहुँचा रहा हो। डॉक्टर ने सीने का एक्स-रे किया, कुछ नहीं मिला, प्लेट साफ़ थी, डॉक्टर ने दो बार दोहराया कि प्लेट बिलकुल साफ़ है। तांत्रिक के पास गए तो उसने कहा, किसी ने तेरा नाप चुरा लिया है। दुबारा नाप देने से यही होता है। वो तेरी साँस का हिसाब रख लेती है, हर सिलाई में तेरा एक टुकड़ा उधार ले लेती है।
मासी कहती थी कमला बाई भूत-प्रेत नहीं थी। ज़िंदा औरत थी, हाड़-मांस की, बस उसके हाथ में वो हुनर था जो किसी और चीज़ से सीखा हुआ था। दायन होने का यही मतलब है ना, वो मरी हुई नहीं होती, जीते जी ये सब करती है। कमला बाई सिर्फ़ उन्हीं का दूसरा नाप लेती थी जो अकेली आतीं, और हर बार सिर्फ़ एक इंच बदलती, इतना कम कि कोई शक न करे।
रुक्मिणी की साँस आख़िर एक रात रुक गई, शादी के ठीक एक साल बाद, न ज़्यादा न कम।
ये कहानी सुनाकर मासी ने हल्दी का कटोरा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया, जैसे बस इतना ही कहना था। मैंने तब से नियम मान लिया, कभी टूटने नहीं दिया।
आज मेरी अपनी बेटी की शादी है, परसों फेरे हैं, और अभी-अभी दरवाज़े की घंटी बजी है। बाहर वही लड़का खड़ा है, दर्ज़ी की दुकान से, हाथ में पैकेट लिए। कहता है, दूसरी फिटिंग का माल है, दीदी ने भेजा है, कल जो नाप बिगड़ गया था वो ठीक करके भेजा है।
मेरी बेटी कमरे में अकेली है, दुपट्टा सुखा रही है छत पर। मैं पैकेट थामे उस आख़िरी धागे को खोलना शुरू करती हूँ, ये देखने के लिए कि इस बार किसने, कब, और कहाँ नाप लिया था।