
रमेश की ऑटो की पिछली सीट पर एक पायल पड़ी थी। सोने जैसी चमक, घुंघरू नीचे की तरफ़ दबे हुए, जैसे किसी ने जानबूझकर उलटा रखा हो। हाथ बढ़ाकर छुआ तो घुंघरू नहीं बजे, एक भी नहीं। रमेश ने सोचा किसी सवारी की गिरी होगी, जेब में डाल ली, और स्टेशन के बाहर कोहरे में जाकर खड़ा हो गया। पिछले हफ़्ते भी किसी सवारी का मोबाइल छूट गया था सीट पर, वो तो अगले दिन वापस लेने आया था, इसलिए रमेश को कुछ अजीब नहीं लगा।
रात के पौने ग्यारह बजे इटारसी जंक्शन से आख़िरी ट्रेन निकल चुकी थी। प्लेटफ़ॉर्म की बत्तियाँ धुंध में पीली गोल टिकियों जैसी लग रही थीं। एक औरत घूँघट काढ़े स्टैंड की तरफ़ आई। बोली — शिवनी कॉलोनी, वाला घर, नंबर नहीं है, बरगद के पास। रमेश ने गाड़ी बढ़ाई। रास्ते भर वो कुछ नहीं बोली, बस साड़ी का पल्लू घुटनों पर टिकाए बैठी रही। बरगद के पास उतरी, पुराने सिक्कों में किराया थमाया, अंदर चली गई। रमेश ने पीछे मुड़कर देखा तक नहीं। उसने सिक्के गिने भी नहीं, जेब में डाल लिए, घर जाकर गल्ले में उलट दिए।
दूसरी फॉगी रात, वही पायल फिर सीट पर मिली। रमेश को याद आया कि उसने तो इसे जेब में रखा था, गल्ले में डाल दिया था घर पहुँचकर, या शायद पत्नी ने उठाकर कहीं रख दिया हो, ठीक याद नहीं। फिर भी वो सीट पर पड़ी थी, घुंघरू उलटे। इस बार उसने ध्यान नहीं दिया।
वही औरत आई। वही शब्द — शिवनी कॉलोनी, बरगद के पास। रमेश ने गाड़ी बढ़ाई। साइड मिरर में नज़र गई तो लगा औरत के पैर सीट के नीचे नहीं, ऊपर की तरफ़ मुड़े हुए हैं, एड़ी आगे की ओर। उसने आँखें झपकाईं, दुबारा देखा तो सब ठीक था। बरगद के पास वही घर, पर इस बार दीवारों पर काई ज़्यादा जमी लगी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए। शायद कोहरे का असर है, उसने सोचा। सिक्के फिर उसी तरह गिने गए, वो अंदर चली गई।
तीसरी बार रमेश ने ठान लिया कि आज पायल को स्टैंड पर ही किसी को दे देगा, ऑटो में नहीं रखेगा। पर जब वो सीट साफ़ करने झुका, पायल फिर वहीं थी, चमकती हुई, इस बार गर्म, जैसे किसी की चूल्हे के पास पड़ी रही हो।
औरत आई। वही शब्द। इस बार रमेश ने रास्ते में गर्दन मोड़कर पीछे देखने की हिम्मत जुटाई। सीट खाली थी। पायल उसकी कमीज़ की जेब में धड़क रही थी, घुंघरू बिना बजे भी उसे महसूस हो रहे थे, गर्म धातु त्वचा से सटी हुई। बरगद के पास पहुँचा तो घर था ही नहीं। सिर्फ़ जली हुई नींव, काली ईंटें, और उन ईंटों के बीच वही औरत खड़ी थी, पल्लू हटाए, पैर पीछे की तरफ़ मुड़े हुए, एड़ियाँ रमेश की तरफ़।
रमेश ने ऑटो स्टार्ट रखा ही रखा, गाड़ी नहीं मोड़ी। हाथ स्टीयरिंग पर जमे रहे, इंजन की घरघराहट के सिवा कुछ सुनाई नहीं दिया। सुबह जब स्टैंड पर बाकी ड्राइवरों ने उसे जगाया, वो सीट पर बैठा था, हाथ मुट्ठी बंद, आँखें खुली। मुट्ठी खोली गई तो पायल थी, घुंघरू के भीतर राख भरी हुई, और वो अब भी हल्की गर्म थी।
Apurv013 (public domain)