शहरी किंवदंतियाँ और लोककथाएँ
स्थानीय किंवदंतियाँ, शापित अनुष्ठान और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियाँ।
मैं आज तक किसी दर्ज़ी के पास दूसरी बार अकेले फिटिंग के लिए नहीं जाती। पहली बार जाओ, नाप दो, बात खत्म। दूसरी बार जाना पड़े तो साथ में कोई और लड़की ज़रूर हो, चाहे ननद हो या पड़ोस की छोरी। ये नियम मेरी…
0 जवाबनहीं, वो भूत नहीं था। ये बात राजू अंकल ने पहले ही साफ़ कर दी थी, चाय का गिलास टेबल पे पटकते हुए। मैं सिवनी से नागपुर जाने वाली हाईवे के ढाबे पे रुका था, रात के करीब ग्यारह बजे होंगे, बस का इंतज़ार…
0 जवाबदादी हर बार एक ही जगह से कहानी शुरू करती हैं — पानी की टंकी के पास वाले नल से। हम सब चारपाई पर बैठे रहते हैं, लाइट गई हुई होती है, और दादी की आवाज़ अंधेरे में वैसे ही चलती रहती है जैसे कोई पुरानी…
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इटारसी स्टेशन से आख़िरी ऑटो
रमेश की ऑटो की पिछली सीट पर एक पायल पड़ी थी। सोने जैसी चमक, घुंघरू नीचे की तरफ़ दबे हुए, जैसे किसी ने जानबूझकर उलटा रखा हो। हाथ बढ़ाकर छुआ तो घुंघरू नहीं बजे, एक भी नहीं। रमेश ने सोचा किसी सवारी की…
0 जवाब रजिस्टर मेज़ के बीचों-बीच खुला पड़ा है। मैं तो इसे हमेशा दराज़ में बंद करके जाता हूं, ताला भी लगाता हूं कभी-कभी। पन्ना आज की तारीख का नहीं, कल की तारीख का खुला है — 14 नवंबर। उस पर नीली स्याही से,…
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चॉक का निशान
बारिश की आवाज़ थी, यही लगा था मुझे। छत पर टप-टप, हल्की, लगातार। बालकनी में गया तो आसमान साफ़ था, तारे तक दिख रहे थे उस रात। आवाज़ नीचे से आ रही थी, चाचा के घर की सीढ़ियों से — कोई चॉक की डिबिया हिला…
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