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HorrorGod

सिवनी हाईवे पर वो चीज़ भूत नहीं थी

ghostsky-editorialसंपादक

0 पोस्ट · 13 अग॰ 2026 को शामिल हुए

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सिवनी-नागपुर हाईवे के जंगल वाले हिस्से में सेट, जहाँ रात के ट्रक ड्राइवरों की सच्ची कहानियों जैसा माहौल गढ़ने के लिए एक ढाबे को फ्रेम बनाया गया है।

नहीं, वो भूत नहीं था। ये बात राजू अंकल ने पहले ही साफ़ कर दी थी, चाय का गिलास टेबल पे पटकते हुए। मैं सिवनी से नागपुर जाने वाली हाईवे के ढाबे पे रुका था, रात के करीब ग्यारह बजे होंगे, बस का इंतज़ार था। ढाबे का नाम था 'न्यू संतोषी', हालांकि बोर्ड पे संतोषी माता की जगह अब सिर्फ 'न्यू ...ोषी ढाबा' पढ़ा जाता था, बाकी रंग उड़ चुका था। एक कोने में साइकिल के पंचर बनाने वाला बाबू भी बैठा था, चाय पी रहा था, हमारी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं ली उसने।

राजू अंकल पंद्रह साल ट्रक चलाते रहे इसी रूट पे, अब घुटनों की वजह से ढाबा चलाते हैं। बोले, बेटा एक चीज़ बताऊं, यहाँ इस हाईवे पे जितने भी जानवर रात को गाड़ी से कटते हैं, कुत्ता हो, नीलगाय हो, कभी-कभी गाय भी, सुबह जब पहली मालगाड़ी वाली ट्रकें निकलती हैं ना छह बजे, तो सड़क साफ़ मिलती है। लाश गायब। खून का निशान तक नहीं। मैंने कहा हो सकता है नगरपालिका वाले उठा ले जाते हों। अंकल हँस पड़े। बोले नगरपालिका इस जंगल वाले स्ट्रेच में सुबह छह बजे नहीं आती बेटा, वो तो दोपहर बारह बजे भी नहीं आती।

फिर बताया कि नब्बे के दशक में, जब वो खुद ट्रक चलाते थे, एक ड्राइवर था, नाम भूल गया, शायद बंसी, नहीं नहीं बंशी लाल था, हाँ बंशी लाल, वो कहता था इस स्ट्रेच पे कुछ है जो रात को सड़क किनारे बैठा रहता है, जानवर के कटने का इंतज़ार करता है। एक बार बंशी लाल ने एक कुत्ता कटते देखा। गाड़ी रोकी नहीं, बस साइड मिरर में देखा। और उसने कहा कि लाश गिरी नहीं, हवा में लटक गई, जैसे किसी ने ऊपर से पकड़ लिया हो।

ड्राइवरों में एक तरीका था इस बात से बचने का। अगर गलती से गाड़ी के नीचे कोई जानवर आ जाए, आधा मरा हो, तड़प रहा हो, तो गाड़ी रोककर उसे पूरा खत्म करना पड़ता था, लाठी से या पत्थर से। जिंदा नहीं छोड़ते थे। क्योंकि वो चीज़, पिशाच, अंकल ने यही नाम लिया, बोले पंडित जी ने यही बताया था, वो सिर्फ पूरी तरह मर चुकी चीज़ खाता है। आधा जिंदा जानवर उसे नहीं चाहिए, उससे उसे कुछ तकलीफ होती है, जलन जैसी। तो अगर तड़पता जानवर सड़क पे पड़ा रहे, वो चीज़ गुस्से में आ जाती है और गाड़ी के पीछे-पीछे चलती है, हॉर्न की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिला देती है।

बंशी लाल ने एक रात एक नीलगाय को आधा मारा। जल्दी में था, रुका नहीं। अगले तीन रात उसकी गाड़ी के पीछे के टायर से खटखट की आवाज़ आती रही, जैसे कोई पीछे बैठा एड़ी मार रहा हो। चौथी रात उसने गाड़ी रोक के पीछे देखा।

अंकल यहाँ तक बोलकर चुप हो गए। चाय की केतली उठाई, दूसरी तरफ चूल्हे पर रखी, जैसे बात खत्म हो गई हो। मैंने पूछा फिर क्या हुआ बंशी लाल का। बोले, पता नहीं, वो अगले हफ्ते नौकरी छोड़ गया, फिर कभी नहीं दिखा। रूट बदल गया शायद, या शायद बदल नहीं गया, अंकल को खुद ठीक याद नहीं था।

मेरी बस आ गई। मैं चढ़ गया, खिड़की वाली सीट मिली थी। जैसे बस स्टार्ट हुई, हेडलाइट की रोशनी में सड़क किनारे कुछ पड़ा दिखा, कुत्ते जैसा, पर उसका सिर पीछे की तरफ मुड़ा हुआ था, ठीक उलटी दिशा में, जैसे कोई उसे घसीट के वापस मोड़ रहा हो।

by Biswarup Ganguly via Own work — CC BY 3.0

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