मुरैना की गली में भैंसें उसी क्रम में सूखीं

दादी हर बार एक ही जगह से कहानी शुरू करती हैं — पानी की टंकी के पास वाले नल से। हम सब चारपाई पर बैठे रहते हैं, लाइट गई हुई होती है, और दादी की आवाज़ अंधेरे में वैसे ही चलती रहती है जैसे कोई पुरानी रील, जो बीच-बीच में अटक जाती है और दादी को खुद पीछे जाकर टुकड़ा जोड़ना पड़ता है।
मुरैना के उस मोहल्ले में एक ही हैंडपंप था पूरी गली के लिए। लोहे का पुराना, हैंडल टेढ़ा, हर बार खींचते वक़्त चरररर की आवाज़ करता था। सुबह चार बजे से लाइन लगती थी। नंबर था — पहले शर्मा जी का घर, फिर मिश्रा जी का, फिर हम। या शायद मिश्रा जी पहले थे। दादी हर बार यह क्रम थोड़ा बदल के बताती हैं, फिर खुद ही रुक कर कहती हैं, नहीं-नहीं, मिश्रा जी बाद में थे, पहले शर्मा जी का ही नंबर था। फिर आगे बंसल जी, और आख़िर में वो घर जो गली के मोड़ पर था, जहाँ रुकमा रहती थी।
रुकमा अकेली औरत थी, कोई मर्द घर में नहीं, कोई बच्चा नहीं। लोग कहते थे उसने अपने पति को मार डाला था तंत्र से, पर किसी ने साबित नहीं किया। बस इतना था कि उसकी बकरियाँ कभी बीमार नहीं पड़ती थीं, और उसके आँगन में एक पेड़ था जिसपर कभी कौआ नहीं बैठता था। उसी आँगन में एक कुत्ता भी था, काला-भूरा, जो किसी को काटता नहीं था बस दूर से देखता रहता था — वो कुत्ता कहानी में फिर कभी नहीं आता, दादी बस एक बार उसका ज़िक्र करती हैं और भूल जाती हैं।
एक गर्मी की सुबह, हैंडपंप की बारी आने से पहले पानी खत्म हो गया। मिश्रा जी ने रुकमा को मना कर दिया, कहा कल आना, आज पानी नहीं बचा। रुकमा कुछ नहीं बोली। बस अपना खाली घड़ा उठाकर लौट गई, चाल में कोई फ़र्क नहीं आया।
तीसरे दिन मिश्रा जी की भैंस का दूध सूख गया। पूरा थन जैसे किसी ने अंदर से बंद कर दिया हो। पशु डॉक्टर बुलाया, इंजेक्शन लगे। कुछ काम नहीं आया।
हफ़्ते भर बाद हमारे घर की बारी आई। दादी कहती हैं वो खुद उस दिन नल पर खड़ी थीं जब रुकमा घड़ा लेकर आई, और दादी की दादी ने कहा — आज लाइन बहुत लंबी है, तुम बाद में आना। रुकमा ने सिर हिलाया, घड़ा वापस उठाया, और उस दिन दादी को याद है कि उसकी चप्पल की आवाज़ मिट्टी पर बहुत देर तक सुनाई देती रही, गली के मोड़ तक।
पंद्रह दिन में हमारी भैंस का दूध भी बंद हो गया। ठीक उसी क्रम में जिस क्रम में गली ने उसे मना किया था — पहले शर्मा जी, फिर मिश्रा जी, फिर हम, फिर बंसल जी। एक भी घर नहीं छूटा, और क्रम कभी नहीं बदला। जिस दिन जिसने मना किया था, उतने ही दिन बाद उसकी भैंस सूखती थी। हिसाब बिल्कुल पक्का, जैसे किसी ने बही में लिख रखा हो।
पंडित जी बुलाए गए, हवन हुआ, घर-घर हनुमान चालीसा का पाठ भी हुआ, पर भैंसें वापस दूध नहीं देने लगीं। सिर्फ आख़िरी घर बचा था — गली के मोड़ पर, रुकमा का अपना घर। वहाँ कोई भैंस नहीं थी, बस वही बकरियाँ जो कभी बीमार नहीं पड़ती थीं।
उस साल के बाद गली ने कभी किसी को पानी से मना नहीं किया, चाहे घड़ा कितना भी बचा हो। रुकमा एक दिन अचानक गाँव छोड़ गई। कोई नहीं जानता कहाँ।
हर बार जब दादी कहानी खत्म करती हैं, हम पूछते हैं — तो उसके बाद क्या हुआ, भैंसें ठीक हुईं क्या? दादी जवाब नहीं देतीं। उठकर आँगन में जाती हैं, वहाँ रखे मिट्टी के घड़े को हाथ से हिलाकर देखती हैं कि पानी कितना बचा है, और घड़े का मुँह हमेशा गली की तरफ़ मोड़कर रख देती हैं।
"Hand pump porch 1875 farmhouse" by Carol M Highsmith is marked with CC0 1.0. To view the terms, visit https://creativecommons.org/publicdomain/zero/1.0/.