डरावनी कहानियों का संग्रह
HorrorGod
दुनिया भर की सच्ची डरावनी कहानियाँ
- कहानियाँ
- 34
- जवाब
- 0
- सदस्य
- 2
श्रेणियाँ
हर डर की अपनी जगह होती है। चुनिए कि शुरुआत कहाँ से करनी है।
अलौकिक मुठभेड़ें
24 कहानियाँभूत, आत्माएँ और वे चीज़ें जो होनी नहीं चाहिए — पर आपने उन्हें देखा।
प्रेतवाधित स्थान
0 कहानीघर, सड़कें, जंगल और इमारतें जहाँ कुछ गड़बड़ है।
निद्रा पक्षाघात और रात के भय
0 कहानीनींद और जागने के बीच जो आपसे मिलने आता है।
अनसुलझे अनुभव
4 कहानियाँऐसी घटनाएँ जिनकी कोई तार्किक व्याख्या नहीं — रहस्यमय संयोग और भय।
शहरी किंवदंतियाँ और लोककथाएँ
6 कहानियाँस्थानीय किंवदंतियाँ, शापित अनुष्ठान और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियाँ।
डरावनी कथाएँ
0 कहानीहमारे समुदाय की मौलिक डरावनी कथाएँ — स्पष्ट रूप से काल्पनिक चिह्नित।
नवीनतम कहानियाँ
सीधे समुदाय से — सबसे नई गतिविधि सबसे पहले।
- काल्पनिक
टीकमगढ़ के स्कूल की तख्ती तीन बार
पीपल की जड़ में एक तख्ती टिकी थी। लकड़ी की, कोने से थोड़ी झुलसी हुई, जैसे किसी ने चूल्हे के पास रख दी हो। स्कूल में तख्तियाँ अब कोई नहीं लाता, बच्चे मोबाइल पे फोटो खींच के होमवर्क कर लेते हैं। फिर भी…
- काल्पनिक
नरसिंहपुर हाईवे के ढाबे का सातवां नियम
नहीं, वो सियार नहीं था। ये पहले साफ़ कर दूं, क्योंकि मेरे मामा भी यही समझते हैं, और मैं उन्हें कभी टोकता नहीं। पर जो चीज़ मैंने ढाबे पर रहकर देखी, तीन साल रहा वहां... नहीं, ठीक से याद करूं तो ढाई साल…
- काल्पनिक
कानपुर की कमला दर्ज़ी और वो एक इंच
मैं आज तक किसी दर्ज़ी के पास दूसरी बार अकेले फिटिंग के लिए नहीं जाती। पहली बार जाओ, नाप दो, बात खत्म। दूसरी बार जाना पड़े तो साथ में कोई और लड़की ज़रूर हो, चाहे ननद हो या पड़ोस की छोरी। ये नियम मेरी…
नहीं साहब, मैंने कोई चूड़ी नहीं तोड़ी। ये पहली बात साफ़ कर दूँ, क्योंकि आप जब से बैठे हैं, बार-बार यही पूछ रहे हैं। चूड़ी मैंने नहीं तोड़ी, वो तो उतरते वक़्त खुद टूट गई थी। बाकी जो कुछ हुआ, वो मेरा…
0 जवाबमैं सुबह से पत्तल गिन रही थी, तेरहवीं के लिए, और तीन बार गिनती बिगाड़ चुकी थी। अठारह मेहमान थे, अठारह पत्तल, फिर भी मेरा हाथ हर बार उन्नीसवीं रख देता था अलग से, जैसे कोई और भी आने वाला हो। दिमाग असल…
0 जवाबनहीं भाई, तेरह नहीं थे, चौदह थे। ये बात गुरुजी वाचमैन ने खुद बताई थी, बीड़ी सुलगाते हुए, गेट के उस टूटे स्टूल पर बैठकर, जिसका एक पाया ईंट के सहारे टिका था। मैं दमोह के आदर्श हॉस्टल में उनसे मिलने गया…
0 जवाब- काल्पनिक
चिंदवाड़ा की सराफा लाइन वाला दूध
आज सुबह मैं अपनी बेटी की चोटी बाँध रहा था और तीसरी बार रिबन उलटा बाँध दिया। वो चिल्लाई, पापा दर्द हो रहा है, और मुझे पता भी नहीं चला कब खोपड़ी में उँगली फँस गई। दिमाग उसी घर पर अटका था जो गली के…
0 जवाब - काल्पनिक
बरवानी मेले वाली मेहंदी
अरे रुक, यही तो मैं बता रही हूँ, सुन तो पूरी। हाँ वही मेहंदी वाली, कोने वाले स्टॉल की। याद है ना, जो पीपल के पास लगती थी हर साल मेले में, ठीक उसी पेड़ के नीचे जहां छोटू का चाचा हर साल गन्ने का जूस…
0 जवाब नहीं, वो भूत नहीं था। ये बात राजू अंकल ने पहले ही साफ़ कर दी थी, चाय का गिलास टेबल पे पटकते हुए। मैं सिवनी से नागपुर जाने वाली हाईवे के ढाबे पे रुका था, रात के करीब ग्यारह बजे होंगे, बस का इंतज़ार…
0 जवाबपहले लगा नल टपक रहा है। हमारे यहाँ पुराने घरों में यही होता है, रात को सन्नाटा हो तो हर बूंद ड्रम पे ऐसे बजती है जैसे कोई टिक-टिक कर रहा हो। मैं लेटा हुआ मोबाइल में लगा था, सोचा उठकर टोंटी बंद कर…
0 जवाब
अभी ऑनलाइन
सभी देखेंअभी यहाँ कोई नहीं है।
जन्मदिन
सभी देखेंआज किसी का जन्मदिन नहीं है।












