
पीपल की जड़ में एक तख्ती टिकी थी। लकड़ी की, कोने से थोड़ी झुलसी हुई, जैसे किसी ने चूल्हे के पास रख दी हो। स्कूल में तख्तियाँ अब कोई नहीं लाता, बच्चे मोबाइल पे फोटो खींच के होमवर्क कर लेते हैं। फिर भी वो वहाँ थी, पीपल के तने से टिकी, ठीक उस जगह जहाँ सुबह की छाया सबसे लंबी पड़ती है।
मैं टीकमगढ़ के इस सरकारी स्कूल में नई-नई पोस्टिंग पर आई थी, अप्रैल में, जब गर्मी शुरू ही हुई थी। ग्राउंड के आखिरी कोने में वो पेड़ था, इतना पुराना कि उसकी जड़ें ज़मीन से बाहर निकल आई थीं। माली रामप्रसाद उसे कभी नहीं छाँटता था। प्रिंसिपल साहब ने कहा था, उसकी मर्जी है, उसे मत टोको। स्टाफ रूम में एक बार किसी ने बताया था कि रामप्रसाद के घर में एक पालतू मैना है जो सुबह-सुबह प्रार्थना की धुन गाती है, पर वो बात अलग थी, उससे इस कहानी का कोई लेना-देना नहीं। मैंने तख्ती उठाई। पीछे चॉक से कुछ लिखा था, ओ-अ, ओ-आ, बच्चों की तरह अक्षर बनाने की कोशिश, टेढ़े-मेढ़े। मैंने पोंछ दिया, चपरासी से कहा हटा दो, और भूल गई।
दूसरे दिन वही तख्ती वहीं थी। साफ की हुई जगह पर फिर से लिखावट, इस बार एक लाइन नीचे भी — ओ-अ, ओ-आ, म-म-मुंजी। मैंने रामप्रसाद को बुलाया, पूछा किसकी है। वो बीड़ी सुलगाते हुए बोला, इसे छुओ मत मैडम, रहने दो जहाँ है। मैंने कहा ये किसी बच्चे की शरारत होगी, कल छुट्टी के बाद रख के देखते हैं कौन आता है। रामप्रसाद कुछ नहीं बोला। बस पेड़ के तने पर हाथ रख के एक बार सिर झुकाया, जैसे माफी माँग रहा हो, और चला गया। मैंने तख्ती फिर पोंछी। पोंछते वक्त उँगली पर एक निशान बन गया, बिल्कुल जनेऊ जैसा, महीन धागे का। वहाँ कोई धागा था नहीं।
तीसरे दिन मैं जल्दी पहुँची, आठ बजे से पहले, सोचा पकड़ लूँगी किसको भी हो। धूप अभी तिरछी थी, चिड़ियाँ शोर मचा रही थीं, कहीं घंटी बजने की तैयारी हो रही थी। तख्ती वहीं थी, तने से टिकी हुई। लेकिन इस बार लिखावट पूरी थी: ओ-अ, ओ-आ, मुंजी को याद करो मैडम जी। और उसके नीचे मेरा नाम, ठीक वैसे जैसे मैं खुद हस्ताक्षर करती हूँ। वही लूप, वही झुकाव, जैसे किसी ने बहुत देर तक मेरी लिखावट का अभ्यास किया हो। मेरी उँगलियाँ तख्ती के किनारे पर टिकी रह गईं, हिलीं नहीं।
रामप्रसाद पीछे से आ गया था। धीरे से बोला, मैडम जी, बारह साल पहले एक लड़का था, जनेऊ के तीसरे दिन बुखार से मर गया, यहीं इसी पेड़ के नीचे उसकी राख का एक हिस्सा दबा है, पंडित जी ने मना किया था हटाने को। तब से वो पेड़ छोड़ता नहीं। बस लिखता है, खेलता है, और जो उसकी तख्ती उठाए वो उसका दोस्त बन जाता है, हमेशा के लिए।
मैंने पूछा, फिर हटाई क्यों नहीं जाती हमेशा को, आग लगा के? रामप्रसाद ने जवाब नहीं दिया, बस पेड़ की तरफ देखता रहा, बीड़ी उँगलियों में जलती रह गई। पत्तों में कोई हवा नहीं थी। फिर भी ऊपर की एक डाल हिली, बहुत हल्के से, जैसे कोई अभी-अभी उस पर से उतरा हो।
घंटी बज उठी थी, बच्चे ग्राउंड की तरफ भागते हुए आ रहे थे। मेरा हाथ, बिना सोचे, उस तख्ती की तरफ बढ़ रहा था, अपना नाम मिटाने के लिए।
by JaniyonKaMagraEditor via Own work — CC BY 4.0