เรื่องสยองขวัญ
ทุกเรื่องในที่แห่งนี้ล้วนมีคนเคยพบเจอมาจริง — หรือจินตนาการขึ้น — โดยใครสักคนที่ไม่ต่างจากคุณ
- เรื่องแต่ง
टाइपराइटर की आपत्ति
आज मैं स्टाम्प काउंटर की पुरानी अलमारी साफ़ कर रहा हूँ, और तीसरी बार वही फ़ाइल गिरा चुका हूँ। छतरपुर कचहरी परिसर में शाम पाँच बजे के बाद कोई नहीं रुकता। स्टाम्प वेंडर भी अपनी मेज़ समेट कर निकल जाते…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
रात की सफाई
नहीं, मैं झूठ नहीं बोल रही। मैंने कुछ नहीं देखा, बस सुना है। चतरपुर के जिला अस्पताल में मैटरनिटी वार्ड की नाइट ड्यूटी पर लगते ही सिस्टर कमला मुझे एक कागज़ थमाती हैं, हाथ से लिखा हुआ, कोनों से…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
दामोह जंक्शन का पंखा
रात के पौने बारह बजे मुझे लगता है कोई सीटी बजा रहा है, दूर से, इंजन की सीटी जैसी। बैग कंधे पर टिकाकर मैं वेटिंग रूम के दरवाज़े तक जाता हूँ। प्लेटफ़ॉर्म पर कोई ट्रेन नहीं, कोई अनाउंसमेंट नहीं। फिर समझ…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
रात के खाने के बाद वही आहट
मैं मटर छील रही हूँ और तीसरी फली भी पूरी नहीं छिली कि दाने उछल कर परात के बाहर गिर जाते हैं। ध्यान मोबाइल पर है, नेटवर्क तीन घंटे से गया हुआ है, टावर वाले कहते हैं शाम तक आएगा। सुनंदा चाची बरामदे में…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
पंडित जी की कैसेट
नहीं, मैंने टेप रिवाइंड नहीं किया। कसम से, मैं टेबल से हिला तक नहीं था, फिर भी वो शब्द दोबारा बज गया। रात के साढ़े नौ बजे। सतना के जयस्तंभ चौक के पीछे वाली गली में पंडित रामकिशोर जी की संस्कृत ट्यूशन…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
रजिस्टर में कल की तारीख पहले से भरी है
रजिस्टर मेज़ के बीचों-बीच खुला पड़ा है। मैं तो इसे हमेशा दराज़ में बंद करके जाता हूं, ताला भी लगाता हूं कभी-कभी। पन्ना आज की तारीख का नहीं, कल की तारीख का खुला है — 14 नवंबर। उस पर नीली स्याही से,…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
जो बचे उसे जलाना है, फेंकना नहीं
साहब, मैं आपको वही बताऊँगा जो नंदू भैया ने मुझे सिखाया था। जब भी थाली में से कुछ बचे, चाहे एक रोटी का टुकड़ा ही क्यों न हो, उसे पीछे वाले गड्ढे में जलाना है। कुत्तों को मत डालना, नाली में मत बहाना,…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
वो जवाब जो कभी पूछा नहीं गया
मैं मर्चुरी के कॉरिडोर में किसी सवाल का जवाब नहीं देता, चाहे सवाल मुझसे पूछा गया हो या नहीं। भिलाई के जेएलएन हॉस्पिटल में नाइट ड्यूटी करते हुए यह नियम मैंने नहीं बनाया था। राजू भैया ने बनाया था, जो…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
ब्याज वाली अम्मा के घर के नियम
पहले मुझे लगा कोई सिक्का गिरा है, वही टन-टन वाली आवाज़, जैसे कोई पैसा गिनते हुए थाली में डाल रहा हो। फिर ध्यान से सुना तो समझ आया, ये सिक्के की आवाज़ नहीं थी। चूड़ी की थी। एक हाथ में पहनी सात-आठ…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
बरवानी के घाट पर श्राद्ध के नियम
नियम नंबर एक: पत्तल कभी पीठ पीछे मत रखना। यह मैंने किसी से पूछा नहीं, बस बचपन से देखा था कि बड़े-बूढ़े ऐसा नहीं करते, तो मैं भी नहीं करता था। हमारे घर में हर साल दादाजी का श्राद्ध नर्मदा के उसी घाट…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
चॉक का निशान
बारिश की आवाज़ थी, यही लगा था मुझे। छत पर टप-टप, हल्की, लगातार। बालकनी में गया तो आसमान साफ़ था, तारे तक दिख रहे थे उस रात। आवाज़ नीचे से आ रही थी, चाचा के घर की सीढ़ियों से — कोई चॉक की डिबिया हिला…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
वो किताब जो हमेशा गरम रहती है
मैं कभी भी लाइब्रेरी के पिछले कमरे की सीढ़ी नंगे पैर नहीं चढ़ता। चप्पल टूट जाए तो भी नहीं। यह मुझे किसी ने सिखाया नहीं, बस बचपन से पता है, जैसे पता होता है कि दिवाली पर पटाखे रात दस बजे के बाद नहीं…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
पीपल के नीचे घंटी
मैंने वो घंटी नहीं बजाई थी। यह बात मैं खुद से दोहरा रहा था, स्कूल के बरामदे में बैठा, हाथ में टॉर्च लिए जो आधी बैटरी पर टिमटिमा रही थी। रात के साढ़े ग्यारह रहे होंगे, या पौने बारह — घड़ी देखने का…
0 ความคิดเห็น - เรื่องแต่ง
पंप के पास वाली पायल
हैंडपंप का हैंडल उल्टा टंगा था, नीचे की तरफ, जैसे किसी ने ज़बरदस्ती मोड़कर छोड़ दिया हो। मामा के घर के पीछे वाला वही पुराना पंप, जिस पर मैं बचपन में कुल्ला करता था। शादी की तैयारी में सब लगे थे, तंबू…
0 ความคิดเห็น







