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पहले लगा नल टपक रहा है। हमारे यहाँ पुराने घरों में यही होता है, रात को सन्नाटा हो तो हर बूंद ड्रम पे ऐसे बजती है जैसे कोई टिक-टिक कर रहा हो। मैं लेटा हुआ मोबाइल में लगा था, सोचा उठकर टोंटी बंद कर…
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पंडित जी की कैसेट
नहीं, मैंने टेप रिवाइंड नहीं किया। कसम से, मैं टेबल से हिला तक नहीं था, फिर भी वो शब्द दोबारा बज गया। रात के साढ़े नौ बजे। सतना के जयस्तंभ चौक के पीछे वाली गली में पंडित रामकिशोर जी की संस्कृत ट्यूशन…
0 replies मैं कभी भी लाइब्रेरी के पिछले कमरे की सीढ़ी नंगे पैर नहीं चढ़ता। चप्पल टूट जाए तो भी नहीं। यह मुझे किसी ने सिखाया नहीं, बस बचपन से पता है, जैसे पता होता है कि दिवाली पर पटाखे रात दस बजे के बाद नहीं…
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