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HorrorGod

पंडित जी की कैसेट

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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नहीं, मैंने टेप रिवाइंड नहीं किया। कसम से, मैं टेबल से हिला तक नहीं था, फिर भी वो शब्द दोबारा बज गया।

रात के साढ़े नौ बजे। सतना के जयस्तंभ चौक के पीछे वाली गली में पंडित रामकिशोर जी की संस्कृत ट्यूशन है। एक कमरा, एक ट्यूबलाइट जो पिछले शनिवार से टिमटिमा रही है, और एक पुराना पैनासोनिक टेप रिकॉर्डर जिसमें पंडित जी हर बच्चे का श्लोक रिकॉर्ड करके सुनाते हैं ताकि उच्चारण सुधरे। मैं दसवीं में हूं। बाकी बच्चे जा चुके हैं, मैं रुका हूं क्योंकि कल संस्कृत की मौखिक परीक्षा है और मुझे 'रघुवंशे जनिष्यमाणस्य' वाला श्लोक याद करना है। पंडित जी की साइकिल बाहर दीवार से टिकी है, उसकी घंटी टूटी हुई है, महीनों से — इससे कहानी का कोई लेना-देना नहीं, बस याद है क्योंकि आते वक्त उसी में उलझकर मैं गिरते-गिरते बचा था।

पंडित जी थके हुए हैं। चश्मा उतारकर आंखें मलते हैं, फिर टेप चलाते हैं। मेरी आवाज़ सुनाई देती है, गलत जगह पर रुकती हुई। इसके बाद वो खुद बोलते हैं, सही करते हुए — "रघुवंशे जनिष्यमाणस्य, अनन्तर... नहीं नहीं, अनन्तरं।"

टेप में एक और आवाज़ आती है। पंडित जी के बोलने के ठीक बाद, जैसे कोई पीछे बैठा उन्हें टोक रहा हो। "अनन्तरं नहीं, अनन्तरं आदिपर्वणः।" आवाज़ भारी है, पुरानी, किसी बहुत बूढ़े आदमी जैसी, पर उसमें कोई कंपन नहीं। सांस टूटने की कोई आवाज़ नहीं।

पंडित जी का हाथ टेप के ऊपर ही रुक जाता है। वो मुझसे नहीं पूछते कि मैंने कुछ रिकॉर्ड किया या नहीं। बस इतना कहते हैं, "बंद कर दे बेटा, आज के लिए बस।"

मैं पूछता हूं क्यों। वो कुछ नहीं बोलते, अलमारी से एक पुरानी डायरी निकालकर उसमें कुछ लिखने लगते हैं। ऊपर लिखा दिख जाता है — "सन 1987, गुरुजी हरिनारायण शास्त्री, अधूरा पाठ।"

मैं फिर पूछता हूं। इस बार वो बताते हैं कि उनके अपने गुरु, हरिनारायण शास्त्री, इसी कमरे में पढ़ाते थे, कोई चालीस साल पहले — या शायद बयालीस, पंडित जी को खुद ठीक याद नहीं — और एक रात व्याकरण का पाठ बीच में छोड़कर चल बसे। हार्ट अटैक। तब से जो भी इस कमरे में गलत उच्चारण करता है, टेप में एक आवाज़ उसे ठीक कर देती है। पंडित जी हर बार कैसेट बदल देते हैं, पर कमरा नहीं बदलते। किराया कम है, और गुरुजी की किताबें अभी भी अलमारी में रखी हैं।

मैं हंसने की कोशिश करता हूं, कहता हूं शायद टेप खराब है, दोहरी रिकॉर्डिंग हो गई होगी। पंडित जी कुछ नहीं कहते। टेप निकालकर उसे अलमारी में दूसरी पुरानी कैसेटों के साथ रख देते हैं। सबके ऊपर तारीखें लिखी हैं। सबसे पुरानी 1988 की।

घर जाने से पहले मैं आखिरी बार श्लोक दोहराता हूं, धीरे से, बिना टेप के। कहीं दूर से, अलमारी के अंदर से, वही आवाज़ मुझे सही करती है। "जनिष्यमाणस्य नहीं, जनिष्यमाणस्य... ठीक से बोल।"

दरवाज़े तक पहुंचकर मैं पीछे मुड़कर देखता हूं। अलमारी का पुराना ताला, जो हमेशा बंद रहता है, अब खुला झूल रहा है। भीतर सबसे नई कैसेट का फीता खुद-ब-खुद, धीरे-धीरे, बाहर निकल रहा है।

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