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मैं सुबह से पत्तल गिन रही थी, तेरहवीं के लिए, और तीन बार गिनती बिगाड़ चुकी थी। अठारह मेहमान थे, अठारह पत्तल, फिर भी मेरा हाथ हर बार उन्नीसवीं रख देता था अलग से, जैसे कोई और भी आने वाला हो। दिमाग असल…
0 repliesआज सुबह मैं अपनी बेटी की चोटी बाँध रहा था और तीसरी बार रिबन उलटा बाँध दिया। वो चिल्लाई, पापा दर्द हो रहा है, और मुझे पता भी नहीं चला कब खोपड़ी में उँगली फँस गई। दिमाग उसी घर पर अटका था जो गली के…
0 repliesनियम नंबर एक: पत्तल कभी पीठ पीछे मत रखना। यह मैंने किसी से पूछा नहीं, बस बचपन से देखा था कि बड़े-बूढ़े ऐसा नहीं करते, तो मैं भी नहीं करता था। हमारे घर में हर साल दादाजी का श्राद्ध नर्मदा के उसी घाट…
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