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HorrorGod

बरवानी के घाट पर श्राद्ध के नियम

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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नियम नंबर एक: पत्तल कभी पीठ पीछे मत रखना। यह मैंने किसी से पूछा नहीं, बस बचपन से देखा था कि बड़े-बूढ़े ऐसा नहीं करते, तो मैं भी नहीं करता था। हमारे घर में हर साल दादाजी का श्राद्ध नर्मदा के उसी घाट पर होता है — बरवानी वाले राजघाट के नीचे, जहाँ सीढ़ियाँ थोड़ी टूटी हुई हैं और एक पुराना पीपल का पेड़ पानी की तरफ झुका हुआ है। घाट पर एक कुत्ता भी रहता है, भूरा, एक कान कटा हुआ, हर साल वहीं मिलता है, इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं मगर मुझे हर बार याद रहता है।

पंडित जी हर बार वही कहते हैं — पितरों को खिलाओ, फिर कौआ आएगा, फिर मानो मिल गया। इस बार पंडित जी की तबीयत ठीक नहीं थी तो उनके बेटे ने विधि करवाई, नया लड़का था, हड़बड़ी में था। मुझे रस्में याद थीं, अपने चाचा से सुनी हुई, तो मैंने खुद ही अपने लिए नियम बना लिए।

एक — पत्तल पीठ पीछे मत रखो, हमेशा सामने, नज़र में रहे।

दो — पत्तल परोसने के बाद उस जगह से हिलना नहीं, जब तक कौआ न आए। भूख से ज्यादा देर मत टिकने दो खाने को खुला।

तीन — अगर पत्तल से भाप उठनी बंद हो जाए और कौआ अब तक न आया हो, तो समझ लो कोई और खा गया।

चार — गिनती मत भूलना कि कितने पत्तल रखे थे। इस बार मैंने पाँच रखे थे — दादाजी के लिए, परदादा के लिए, और तीन उन पूर्वजों के लिए जिनका नाम भी अब किसी को याद नहीं। दादी बता सकती थीं शायद, पर उन्हें गुज़रे भी अब सात साल हो गए।

पाँच — अगर पत्तल का चावल कम दिखे मगर दाल-सब्जी जस की तस हो, बिना छुए, तो चुप रहो। कुछ मत कहो। बस मन ही मन हनुमान चालीसा शुरू कर दो, धीरे-धीरे, ताकि होंठ हिलें पर आवाज़ बाहर न जाए।

छह — कौआ आने में जितनी देर लगे, उतनी देर पानी की तरफ मत देखो। नर्मदा का बहाव उस वक्त अजीब लगता है, जैसे धीमा हो गया हो, जैसे रुक गया हो।

सात — अगर कोई तुम्हारे कान के पास सांस जैसी आवाज़ सुने, तो समझ लो वह भूखा है। पीछे मत मुड़ो। पितरों की आत्मा और भटकी हुई आत्मा में यही फर्क होता है — पितर इंतज़ार करते हैं, बाकी नहीं करते।

आठ — अगर पत्तल पर उंगलियों के निशान दिखें, गीली मिट्टी जैसे, चौड़ी और मोटी, कौए के पंजे जैसे नहीं, तो विधि रोक दो। नए पंडित के बेटे से मत पूछना। वह घबरा जाएगा और भाग जाएगा, जैसा उस दिन हुआ था, जल्दी में अपना गमछा भी घाट पर छोड़ गया था, वह गमछा अगले साल भी वहीं पड़ा मिला, आधा नर्मदा में बहा जा रहा।

नौ — नौ, अब मुझे ठीक से याद नहीं कि नियम नौ क्या था। शायद यही था कि अगर पानी के पास कोई परछाईं बैठी दिखे, दुबली, कंधे झुके हुए, पत्तल की तरफ मुँह किए, तो उसे गिनती में मत जोड़ो। पाँच पत्तल थे। छह परछाइयाँ नहीं थीं। थीं क्या।

दस — दसवां नियम मैंने उसी दिन बनाया जब मैंने देखा कि पत्तल पर से चावल गायब हो चुका था, पूरी तरह, दाने-दाने तक साफ, और कौआ अभी घाट की सीढ़ियों पर उतरा ही था, अपने पंख फड़फड़ाता, मानो उसे भी लग रहा हो कि उसका हिस्सा कोई और पहले ही खा चुका है।

मैं वहीं बैठा रहा। हाथ की उंगलियाँ पत्तल के किनारे को छूती रहीं, बार-बार, बिना वजह। कौआ पत्तल पर उतरा, चोंच मारी, कुछ न पाकर उड़ गया। सीढ़ियों के गीले पत्थर पर, पत्तल के ठीक बगल में, दो पैरों के निशान बने थे, पानी की तरफ से घाट की तरफ आते हुए, एड़ी आगे और पंजे पीछे की ओर।

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