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HorrorGod

चिंदवाड़ा की सराफा लाइन वाला दूध

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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कहानी मध्य प्रदेश के चिंदवाड़ा शहर की सराफा लाइन मोहल्ले में रखी गई है, जहाँ पुराने घरों और दूध की साइकिल-सप्लाई वाली गलियों का माहौल इस डर को असली टेक्सचर देता है।

आज सुबह मैं अपनी बेटी की चोटी बाँध रहा था और तीसरी बार रिबन उलटा बाँध दिया। वो चिल्लाई, पापा दर्द हो रहा है, और मुझे पता भी नहीं चला कब खोपड़ी में उँगली फँस गई। दिमाग उसी घर पर अटका था जो गली के आख़िर में है, नंबर सात, जिसका ताला अब भी वैसे ही लगा है जैसे तीन हफ़्ते पहले लगा था।

मैं चाचा की जगह दूध की सप्लाई सँभालता हूँ, चिंदवाड़ा की सराफा लाइन में। पुराना रूट है। हर घर पहचानता हूँ, हर घर का कुत्ता भी पहचानता है मुझे, सिवाय शर्मा जी के घर वाले भूरे कुत्ते के जो हर बार नया जन्म लेता है और भूल जाता है कि मैं कौन हूँ। नंबर सात में रहती थीं शांति बाई, अकेली, कोई औलाद नहीं थी उनकी, ऐसा सब कहते थे। महीने भर पहले वो चल बसीं, अचानक, नींद में ही। घर पर ताला लग गया, भतीजा भोपाल से आया, कागज़-पत्तर करके वापस चला गया। कहा था, जब तक ज़मीन का मामला निपटे, दूध बंद कर दो।

मैंने बंद कर दिया था। पर उस रात से दो दिन पहले, गलती से, आदत से, पैकेट फिर उसी दरवाज़े पर टाँग आया था। सुबह देखा तो पैकेट खाली पड़ा था। कटा नहीं, फटा नहीं। बस सिरा खुला और अंदर कुछ नहीं। सोचा बिल्ली होगी, पर बिल्ली दाँत से खोलती है, फाड़कर खोलती है। यहाँ सिरा इतना साफ़ था जैसे किसी ने उँगली से मोड़कर खोला हो, धीरे-धीरे, जैसे कागज़ की नाव बनानी हो।

तीन हफ़्ते पहले की बात है ये। उसके बाद मैंने वहाँ दूध रखना बंद कर दिया, तय भी था कि नहीं रखना। फिर भी हर दूसरे दिन एक पैकेट अपने आप वहाँ पहुँच जाता। शायद रामू का लड़का ग़लती से रख आता होगा, वो नया है रूट पर, अभी हफ़्ते भर पहले ही उसकी शादी तय हुई है, दिमाग वहीं अटका रहता है उसका। हर बार सुबह पैकेट खाली मिलता।

अभी वाली बात करूँ। कल रात मैं आख़िरी राउंड पर था। साढ़े ग्यारह बज गए थे, स्कूटर की लाइट भी मरी हुई थी, बस मोबाइल की टॉर्च से रास्ता देख रहा था। नंबर सात के आगे से गुज़रा तो देखा दरवाज़े की झिर्री से हल्की सी रोशनी बाहर आ रही है। ताला वहीं लटका था, वैसे ही जैसे भतीजा लगा गया था। बस अब उस पर धूल की जगह गीली उँगलियों के निशान थे, पाँच-पाँच, एक कतार में, जैसे किसी छोटे हाथ ने ताले को थाम कर खुद को ऊपर खींचा हो।

मुझे रुकना नहीं चाहिए था, ये पता है, पर पैर रुक गए। खिड़की के पास गया, वो जो पीछे की तरफ़ है, जिसका शीशा टूटा है और शांति बाई ने कभी ठीक नहीं करवाया था, उससे झाँका। अंदर अंधेरा था, फ़र्श पर कुछ चमक रहा था, दूध बिखरा हुआ, ताज़ा, उसमें से भाप जैसी हल्की सफ़ेदी उठ रही थी। उस बिखरे दूध के बीचोबीच, गोल घेरे में, छोटे-छोटे पैरों के निशान थे, दस-बारह, एक ही जगह चारों तरफ़ घूमते हुए। जैसे कोई बच्चा उसी घेरे में नाच रहा हो। और हर निशान का पंजा पीछे की तरफ़ मुड़ा हुआ था।

मैंने खिड़की से हाथ हटाया और सीधा घर की तरफ़ भागा। बेटी का कमरा देखा, वो सो रही थी, ठीक थी। पर आज सुबह जब उसकी चोटी बाँध रहा था तो उसने कहा पापा तुम्हारी उँगलियाँ ठंडी हैं। मैंने कंघी नीचे रख दी और खिड़की की तरफ़ देखा, जहाँ पिछली रात एक खाली दूध का पैकेट हमारी अपनी दहलीज़ पर, अंदर की तरफ़ से मुड़ा हुआ, करीने से रखा हुआ था।

"Metal Door" by Marko Tabak is marked with CC0 1.0. To view the terms, visit https://creativecommons.org/publicdomain/zero/1.0/.

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