แท็ก: लोक-कथा
नहीं साहब, मैंने कोई चूड़ी नहीं तोड़ी। ये पहली बात साफ़ कर दूँ, क्योंकि आप जब से बैठे हैं, बार-बार यही पूछ रहे हैं। चूड़ी मैंने नहीं तोड़ी, वो तो उतरते वक़्त खुद टूट गई थी। बाकी जो कुछ हुआ, वो मेरा…
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चिंदवाड़ा की सराफा लाइन वाला दूध
आज सुबह मैं अपनी बेटी की चोटी बाँध रहा था और तीसरी बार रिबन उलटा बाँध दिया। वो चिल्लाई, पापा दर्द हो रहा है, और मुझे पता भी नहीं चला कब खोपड़ी में उँगली फँस गई। दिमाग उसी घर पर अटका था जो गली के…
0 ความคิดเห็น हमारे यहाँ एक ही नियम है, बाकी सब चलता है। सीट नंबर बत्तीस की टिकट कभी नहीं काटी जाती। चाहे बस खचाखच भरी हो, चाहे कोई खड़ा होकर पूरा रास्ता जाने को तैयार हो, रामलाल भैया उस सीट की तरफ़ इशारा भी नहीं…
0 ความคิดเห็นहमने पहले ही रात को गिनती शुरू कर दी थी, पर तब तक हमें नहीं पता था कि किस चीज़ की गिनती हो रही है। निशा की शादी को तीन महीने हुए थे, या शायद साढ़े तीन, अम्मा को ठीक याद नहीं रहता ऐसी बातें। गर्मी में…
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