टैग: naale-baa
मैं बर्तन माँज रही थी और तीसरी थाली अभी तक साबुन से भरी पड़ी थी, हाथ चल रहे थे पर दिमाग दरवाज़े पर अटका था। रात के साढ़े नौ बजे थे, खाना खत्म हुए बीस मिनट भी नहीं हुए थे — या शायद पंद्रह ही हुए थे,…
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रात के खाने के बाद वही आहट
मैं मटर छील रही हूँ और तीसरी फली भी पूरी नहीं छिली कि दाने उछल कर परात के बाहर गिर जाते हैं। ध्यान मोबाइल पर है, नेटवर्क तीन घंटे से गया हुआ है, टावर वाले कहते हैं शाम तक आएगा। सुनंदा चाची बरामदे में…
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चॉक का निशान
बारिश की आवाज़ थी, यही लगा था मुझे। छत पर टप-टप, हल्की, लगातार। बालकनी में गया तो आसमान साफ़ था, तारे तक दिख रहे थे उस रात। आवाज़ नीचे से आ रही थी, चाचा के घर की सीढ़ियों से — कोई चॉक की डिबिया हिला…
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