मैं कभी भी लाइब्रेरी के पिछले कमरे की सीढ़ी नंगे पैर नहीं चढ़ता। चप्पल टूट जाए तो भी नहीं। यह मुझे किसी ने सिखाया नहीं, बस बचपन से पता है, जैसे पता होता है कि दिवाली पर पटाखे रात दस बजे के बाद नहीं जलाने।
यह बात मुझे मेरे नाना ने बताई थी, जब मैं दसवीं में था और छतरपुर वाले घर में गर्मी की छुट्टियां बिता रहा था। नाना जिला लाइब्रेरी में चालीस साल क्लर्क रहे, वही पुरानी अंग्रेज़ों के ज़माने की बिल्डिंग, जिसकी छत पर आज भी गिद्ध बैठते हैं। बगल वाली गली में मामा का दोस्त रहता था जिसके यहां एक कुत्ता था जो हमेशा उसी बिल्डिंग की तरफ मुंह करके भौंकता, पर उस बात का इस कहानी से कोई लेना-देना नहीं, बस याद रह गई है।
नाना ने बताया कि लाइब्रेरी के पीछे एक कमरा है जिसे कभी किसी ने खुला नहीं देखा। ताला भी नहीं लगा, बस दरवाज़ा सूजा हुआ है, इतना कि सौ आदमी मिलकर धक्का दें तो नहीं खुलेगा। पुराने लोग कहते थे वहां अंग्रेज़ों के ज़माने से पहले एक पंडित रहता था। नाम किसी को याद नहीं, बस इतना कि वो संस्कृत और ज्योतिष का जानकार था और उसने अपनी सारी उम्र एक ग्रंथ लिखने में लगा दी जो कभी पूरा नहीं हुआ। मरते वक्त उसने कहा था कि जब तक किताब पूरी नहीं होगी, वो जाएगा नहीं।
नाना कहते थे हर साल जनवरी में, जब कड़ाके की ठंड पड़ती, लाइब्रेरी में सफाई करने वाला बुधिया कमरे के पास से गुज़रते हुए दरवाज़े की दरार में हाथ डालकर एक किताब निकाल लाता। क्यों, ये किसी को नहीं पता। बस रिवाज़ था, बुधिया के बाप का भी और उससे पहले वाले का भी। वो किताब बाकी सबसे अलग होती। बाकी सारी अलमारियां बर्फ जैसी ठंडी रहतीं, मगर वो एक किताब हमेशा गरम रहती, जैसे अभी-अभी किसी की गोद से उठाई हो। नाना ने खुद उसे एक बार छुआ था। हाथ पर छाला नहीं पड़ा, मगर उंगलियां तीन दिन कांपती रहीं — ये बात वो हर बार सुनाते वक्त अपना दाहिना हाथ देख लेते थे, जैसे अब भी जांच रहे हों।
सन उनहत्तर में, या शायद सत्तर में, ठीक याद नहीं, एक नया लाइब्रेरियन आया था शहर से बाहर का। उसने ये सब अंधविश्वास मानकर कमरे का दरवाज़ा बढ़ई बुलाकर तुड़वा दिया। उस रात लाइब्रेरी में बिजली चली गई थी, अकेली उस बिल्डिंग की, बाकी पूरा मोहल्ला रोशन था। सुबह जब दरवाज़ा खुला तो कमरा खाली मिला। बस दीवार पर एक अधूरा श्लोक खुदा हुआ था, और लाइब्रेरियन की मेज़ पर कलम इस तरह रखी थी जैसे किसी ने अभी-अभी लिखना बंद किया हो, स्याही अभी तक गीली।
लाइब्रेरियन का तबादला अगले हफ्ते हो गया, अपनी मर्ज़ी से, बिना किसी वजह के। वो फिर कभी शहर वापस नहीं आया।
नाना ये किस्सा सुनाते वक्त बार-बार अपनी घड़ी देखते, जैसे किसी और वक्त का इंतज़ार कर रहे हों। मैंने पूछा था कि क्या वो किताब आज भी वहां है। नाना ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी अलमारी से एक पुराना बस्ता निकाला जिसमें उनकी नौकरी के काग़ज़ात रखे थे, और उसे वापस उतनी ही सफाई से रख दिया जितनी सफाई से निकाला था।
पिछले महीने नाना गुज़र गए। घर साफ करते वक्त मां ने वही बस्ता निकाला। उसके नीचे, अखबार में लिपटी हुई, एक पुरानी चमड़े की जिल्द वाली किताब रखी थी।
जब मैंने उसे उठाया, वो गरम थी।