आज मैं स्टाम्प काउंटर की पुरानी अलमारी साफ़ कर रहा हूँ, और तीसरी बार वही फ़ाइल गिरा चुका हूँ। छतरपुर कचहरी परिसर में शाम पाँच बजे के बाद कोई नहीं रुकता। स्टाम्प वेंडर भी अपनी मेज़ समेट कर निकल जाते हैं, बस मैं हूँ और चपरासी रामसजीवन का पुराना ताला, जो हर बार खोलने में तीन कोशिश लेता है। मेरा ध्यान कागज़ों में नहीं, फ़ोन में है। बेटी का रिज़ल्ट आने वाला है, नेटवर्क यहाँ आधा ही चलता है, कभी-कभी बिल्कुल नहीं।
तीन हफ़्ते पहले, जब मुझे यहाँ रेकॉर्ड कीपर बनकर आए दस दिन हुए थे — नहीं, शायद बारह दिन, ठीक याद नहीं — रामसजीवन ने कहा था, "बाबूजी, कमरा नंबर सात के पीछे वाला टाइपराइटर मत छेड़ना।" वो एक पुरानी रेमिंगटन थी, अंग्रेज़ों के ज़माने की, जिस पर अब कोई टाइप नहीं करता। मैंने हँसकर पूछा था क्यों, तो उसने बस कंधे उचका दिए और बीड़ी सुलगा ली। उसकी बीड़ी हमेशा आधी जली छोड़ देने की आदत है, मुझे नहीं पता क्यों, शायद पैसे बचाने के लिए।
आज उसी कमरे के दरवाज़े से आवाज़ आती है — खट, खट, खट-खट। मशीन जैसी टकटकाहट। मैं फ़ाइल हाथ में लिए वहीं रुक जाता हूँ, पंजों पर वज़न बदलता हूँ, पहले सोचता हूँ शायद कोई पंखा है जो पुरानी कील पर हिल रहा है। मगर पंखा तो बंद पड़ा है। इस कमरे में बिजली ही नहीं आती, कभी आई ही नहीं जब से मैं यहाँ हूँ।
तीन हफ़्ते पहले मैंने रामसजीवन को छेड़ने के लिए पूछा था कि क्या भूत है वहाँ। उसने बीड़ी का धुआँ छोड़ते हुए बताया कि साठ के दशक में यहाँ एक पंडित जी वकील थे, नाम शायद द्विवेदी था, या दुबे, उसे ठीक याद नहीं। कहते हैं वो केस बीच में छोड़कर मर गए, और उनकी आत्मा अब भी उसी टाइपराइटर पर अपनी अधूरी अर्ज़ी टाइप करती रहती है। हर उस काग़ज़ पर आपत्ति लगाती है जिसे वो जायज़ नहीं मानती। रामसजीवन ने ये भी बताया कि स्टाम्प वेंडर लोग शाम को अपने बचे स्टाम्प पेपर वहीं टेबल पर छोड़ जाते हैं ताकि रात में कोई परेशानी न हो। "ब्रह्मराक्षस थे साहब," उसने कहा, "बहुत विद्वान, बहुत गुस्सैल भी।" फिर उसने अपनी बीड़ी की राख झाड़ी और अपने साले के बारे में कुछ बताने लगा जिसका किसी और मामले में तबादला हो गया था, बात वहीं छूट गई।
आज दरवाज़ा भीतर से बंद है, मगर उसकी दरार से पीली रौशनी झलक रही है, जैसे लालटेन जल रही हो। खट-खट रुकती नहीं। मैं फ़ाइल छाती से चिपकाए कदम पीछे खींचता हूँ, हाथ की उंगलियाँ ठंडी पड़ गई हैं, मगर पैर उलटी दिशा में मुड़ते जाते हैं, दरवाज़े की तरफ़। मुझे याद आता है कि आज मैं जो फ़ाइल लाया हूँ, वो मेरी अपनी ज़मीन के केस की नकल है, जिसे मैंने कल दाखिल करने से पहले चुपके से यहीं छुपा दिया था। बिना स्टाम्प के। बिना पूरी गवाही के।
मैं दरवाज़ा हल्का सा धकेलता हूँ। भीतर मेज़ पर वो रेमिंगटन रखी है, काली, भारी। चाबियाँ अपने आप दब रही हैं, कोई हाथ नहीं दिख रहा। मेज़ के उस पार कुर्सी खाली है, मगर उसका कपड़ा किसी बैठे हुए वज़न से दबा हुआ लगता है, जैसे कोई अभी उठा हो और वापस बैठने वाला हो। टाइपराइटर से निकला काग़ज़ आधा बाहर लटक रहा है। मैं पास जाकर उसे पढ़ने की हिम्मत जुटाता हूँ।
उस पर सिर्फ़ मेरे नाम की जगह पर एक शब्द टाइप हुआ है — आपत्ति — और नीचे, मेरी अपनी लिखावट में, जो मैंने कभी नहीं लिखी, मेरी बेटी के स्कूल का पूरा पता।