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HorrorGod

रात के खाने के बाद वही आहट

ghostsky-editorialบรรณาธิการ

0 โพสต์ · เข้าร่วมเมื่อ 13 ส.ค. 2569

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छतरपुर, मध्य प्रदेश की गढ़ी वाली गली में सेट, जहाँ मोहल्ले की तंग गलियों और पड़ोसियों की आपसी पहचान की बुनावट कहानी की नींव बनती है।

मैं मटर छील रही हूँ और तीसरी फली भी पूरी नहीं छिली कि दाने उछल कर परात के बाहर गिर जाते हैं। ध्यान मोबाइल पर है, नेटवर्क तीन घंटे से गया हुआ है, टावर वाले कहते हैं शाम तक आएगा। सुनंदा चाची बरामदे में खटिया पर बैठी सुपारी कतर रही हैं, और मुझे कहती हैं, "इधर आ, बत्ती बचा, मटर बाद में छिलेगा।"

मैं परात लेकर उनके पास बैठ जाती हूँ। चाची का घर हमारे घर के ठीक पीछे है, गढ़ी वाली गली, छतरपुर के इसी मोहल्ले में जहाँ हर तीसरे घर में कोई न कोई इनसे रिश्ता निकल आता है। उनके बगल में उनकी कुतिया मोती लेटी हुई है, जिसे पिछले महीने ही किसी ने ज़हर दे दिया था और जो अब भी ठीक से चल नहीं पाती, पर ये उस रात की बात से कोई लेना-देना नहीं रखती, बस मैं बताना चाहती थी कि वो वहाँ थी।

"बंसी काका को तो जानती है न," चाची बोलती हैं, सुपारी की एक कतरन दांत के नीचे दबाकर। "वही, जिनका घर नुक्कड़ पर था, जो हर शाम खाना खाने के बाद निकलते थे टहलने। रास्ते में हमारे दरवाज़े पर आकर तीन बार खटखटाते थे। ठक-ठक... ठक। बीच में रुककर, फिर आखिरी वाली ज़रा धीमी। पूरे मोहल्ले को पता था वो आवाज़, कोई और उस तरह नहीं खटखटाता था।"

चाची सुपारी कतरना बंद कर देती हैं। "वो गुज़रे तो तीन साल हो गए, या शायद साढ़े तीन, ठीक याद नहीं। लेकिन उनके मरने के छह महीने बाद की बात है, हम खाना खा चुके थे, बर्तन भी धुल गए थे, तभी दरवाज़े पर वही आवाज़ आई। ठक-ठक... ठक। मैं तो जैसे उछल पड़ी। तेरे चाचा बोले, कोई बच्चा शरारत कर रहा होगा, दरवाज़ा खोलने लगे।"

"खोला?" मैं पूछती हूँ, हाथ में अभी भी एक फली पकड़े हुए, छीलना भूल गई हूँ।

"मैंने रोका। कहा, पहले खिड़की से देखो।"

बाहर कोई नहीं था। गली सुनसान। मगर आवाज़ आई थी बिल्कुल पास से, दरवाज़े के उसी हिस्से से जहाँ बंसी काका हमेशा खटखटाते थे, नीचे से थोड़ा ऊपर, जहाँ लकड़ी में वो पुराना निशान है। मैं दरवाज़े की तरफ देखती हूँ बिना चाहे, जैसे कोई और मेरी गर्दन घुमा रहा हो।

"बूढ़ी काकी ने बाद में बताया," चाची आगे बोलती हैं, आवाज़ धीमी करते हुए, "ये नाले बा होता है। मरे हुए की आवाज़ चुरा लेता है, उसकी चाल, उसका खटखटाने का ढंग, सब याद रख लेता है, और फिर वैसे ही आता है जैसे वो आदमी अभी भी जिंदा हो और मिलने आया हो। पर एक ही रात में उतनी ही बार खटखटा सकता है जितनी बार वो आदमी सचमुच खटखटाता था। बंसी काका हमेशा तीन बार खटखटाते थे, तो उस रात भी तीन ही बार आवाज़ आई, उसके बाद कुछ नहीं।"

"और अगर दरवाज़ा खोल देते तो?"

चाची कंधे उचका देती हैं, जवाब नहीं देतीं। सुपारी की कतरन फिर से शुरू कर देती हैं, जैसे कहानी वहीं खत्म हो गई हो। मोती करवट बदलती है और फिर सो जाती है।

मैं परात नीचे रख देती हूँ। मटर के दाने अब भी बिखरे पड़े हैं, आधे छिले, आधे साबुत, कुछ परात के बाहर परात से दूर भी। तभी हमारे दरवाज़े पर आवाज़ आती है।

ठक-ठक... ठक। बीच में रुककर, आखिरी वाली ज़रा धीमी, ठीक वैसे ही जैसे हमारे पड़ोसी दुबे जी हर रात खाना खाने के बाद खटखटाते हैं, सिवाय इसके कि दुबे जी की मौत की खबर आज सुबह ही आई है।

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