Skip to main content
HorrorGod

सीढ़ी पर सिर्फ ऊपर जाने के निशान

0 posts · Joined Aug 13, 2026

4 min read4 views0 replies
Listen to this storyDownload MP3 · 4:53

कहानी कटनी, मध्य प्रदेश के एक पुराने पारिवारिक घर में रखी गई है, जहाँ पास से बहने वाले नाले की पुरानी कहानियाँ आज भी घरों में सुनाई जाती हैं।

मीरा ने सीढ़ी के तीसरे डंडे पर पानी की बूंद देखी, फिर चौथे पर, फिर पाँचवें पर। हर बूंद के इर्द-गिर्द साड़ी के पल्लू जैसा गीला घेरा था, पंजे का निशान साफ़, पर एड़ी का निशान कहीं नहीं। जैसे कोई सिर्फ पंजों पर चलकर ऊपर गया हो। मार्बल की बाकी सीढ़ी बिल्कुल सूखी थी। बाहर बारिश नहीं हुई थी, कटनी में तीन दिन से मौसम साफ़ था। घर में किसी ने भी नहीं कहा कि आज नहाकर कहीं गई हो।

बुआ रसोई से आवाज़ लगा रही थीं, "मीरा, चाय बना दे," पर मीरा सीढ़ी पर ही खड़ी रही, ऊँगली से गीलेपन को छूकर देखती रही। ठंडा पानी था, नाले जैसा, हल्की मिट्टी की गंध लिए हुए। ऊपर मोबाइल पर चार्जिंग की आवाज़ भी आ रही थी, कहीं दूर, शायद बुआ के कमरे से, पर उस पर मीरा का ध्यान नहीं गया।

बुआ आईं, देखा, और सीढ़ी की रेलिंग पर हाथ रखकर बैठ गईं। "ये हर साल इस रात को होता है," उन्होंने कहा, दुपट्टे का कोना उँगलियों में मोड़ते हुए—ये उनकी पुरानी आदत थी जब भी कुछ याद करना होता। "तेरी दादी की मुँहबोली बहन थी, सुगना ताई। शादी के दो साल बाद ही नहर में डूब गई थी, गाँव के पीछे वाले नाले में, वो जो अब पक्का हो गया है, तब कच्चा था। किसी ने धकेला या खुद फिसली, कोई नहीं जानता। बस इतना पता है कि उसकी साड़ी का पल्लू नाले की गाद में फँस गया था, और तीन दिन बाद जब मिली तो पंजे मुड़े हुए थे, जैसे किसी ने ऊपर की तरफ खींचा हो।"

"उसके बाद से," बुआ बोलती रहीं, चाय की पतीली को भूलकर, "जिस भी घर में उसका खून है, वहाँ साल में एक बार, ठीक उसी रात को, सीढ़ी पर उसके पंजों के निशान बनते हैं। हमेशा ऊपर जाते हुए, कभी नीचे उतरते नहीं। और अगर घर में कोई अकेला ऊपर हो उस रात, तो दरवाज़े पर आवाज़ आती है। एक जानी-पहचानी आवाज़, माँ की, बहन की, जिसकी भी सबसे ज़्यादा याद आ रही हो उस वक़्त। तीन बार बुलाती है। दो बार तक नाम सही बोलती है। तीसरी बार में एक अक्षर उलट जाता है, कोई नहीं जानता क्यों, बस उलट जाता है। जो पहचान ले, बच जाता है। जो चौथी बार का इंतज़ार करता है, वो फिर कभी सीढ़ी से नीचे नहीं आता।"

मीरा ने हँसने की कोशिश की। "बुआ, ये तो नानी वाली कहानी है, डराने के लिए।" उसे याद आया कि पिछली बार भी बुआ ने ऐसी ही कोई बात कही थी, तब भूत की नहीं, किसी साधु की, जो कुएँ में रहता था। शायद घरों में हर साल एक नई कहानी बनती है, या शायद मीरा को ठीक से याद नहीं।

"डराने के लिए नहीं था," बुआ ने कहा। आवाज़ में हड़बड़ी नहीं थी, बस थकान, जैसे यह बात वो बरसों से दोहरा रही हों। "तेरे बड़े चाचा की छोटी बहन थी, कमला। वो ठीक से नहीं समझी। तीसरी बार का नाम ठीक से सुना नहीं, गई ऊपर। सुबह छत का दरवाज़ा खुला मिला, कमला कहीं नहीं मिली। घर में अब उसका ज़िक्र नहीं होता।"

रसोई में पतीली की सीटी बजी। दोनों चौंक गईं। बुआ उठकर चली गईं। मीरा वहीं सीढ़ी के पास खड़ी रह गई, ऊपर की तरफ देखती हुई। छत का दरवाज़ा आधा खुला था, और उसमें से बाहर की काली हवा भीतर आ रही थी।

रात के करीब ग्यारह बजे, जब घर सो गया, मीरा को नीचे से आवाज़ आई। उसकी माँ की आवाज़, ठीक वैसी ही, वही खिंचाव जब वो थकी होती थी। "मीरा," पहली बार। फिर दूसरी बार, वैसी ही। मीरा ने रज़ाई खींच ली, दोनों हाथों की मुट्ठियाँ भींच लीं, गिनती करती रही, एक, दो।

तीसरी बार आवाज़ आई, नाम में एक अक्षर बदला हुआ, "मीरो"। मीरा ने आँखें बंद कर लीं, सांस थामे रही, हिली नहीं।

सुबह सीढ़ी पर वही निशान थे, पर इस बार एक कदम ऊँचा, तीसरे डंडे से लेकर छठे डंडे तक, हर बार सिर्फ ऊपर की ओर बढ़ते हुए। सबसे ऊपरी निशान की उंगलियाँ ठीक उस दरवाज़े की चौखट को छूती हुई थीं जिसके पीछे मीरा सोई थी।

by Biswarup Ganguly via Own work — CC BY 3.0

No ratings yetSign in to rate

Replies0 replies

No one has dared to reply yet.

Only members can reply to this story.