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HorrorGod

रेवा के हॉस्टल के दरवाज़े पर तेरहवाँ निशान

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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नहीं भाई, तेरह नहीं थे, चौदह थे। ये बात गुरुजी वाचमैन ने खुद बताई थी, बीड़ी सुलगाते हुए, गेट के उस टूटे स्टूल पर बैठकर, जिसका एक पाया ईंट के सहारे टिका था। मैं दमोह के आदर्श हॉस्टल में उनसे मिलने गया था। मेरे मामा का लड़का वहीं रहता था, बारहवीं की तैयारी कर रहा था, और उसकी माँ ने कहा था जाते वक्त कुछ फल दे आना।

हॉस्टल का नियम सीधा था। गुरुजी हर रात साढ़े नौ बजे राउंड लगाते, हर कमरे के दरवाज़े पर चूने से एक लाइन खींचते, ऊपर कोने में, छोटी सी। ये गिनती होती कि परीक्षा तक कितने दिन रह गए, हर लड़के के कमरे पर अलग गिनती, क्योंकि सबकी परीक्षा की तारीख अलग थी। लड़के सुबह उठकर पहले वो लाइन गिनते, फिर बुक खोलते। किसने शुरू किया ये रिवाज़, कोई नहीं जानता था, बस चलता आ रहा था, जैसे मेस में मंगलवार को खिचड़ी बनना चलता आ रहा था बिना किसी वजह के।

अशीष कमरा नंबर बारह में था। उसकी माँ रोज़ रात ठीक साढ़े नौ बजे फोन करती। बस दो मिनट की बात होती, बेटा खाना खाया, पढ़ाई कैसी चल रही है, सो जाना जल्दी। घड़ी जैसा पक्का टाइम, एक मिनट आगे-पीछे नहीं। गुरुजी को भी ये आदत पता थी, क्योंकि वो जब राउंड पर होते तभी बारह नंबर से घंटी की आवाज़ सुनाई देती।

उस रात गुरुजी ने चूना उठाया और बारह नंबर पर तेरहवीं लाइन खींची। कुल तेरह दिन बचे थे परीक्षा में। ये उन्हें अच्छे से याद था, सुबह ही पंडित जी ने बताया था, तेरह दिन, अभी वक्त है। लाइन खींचकर वो आगे बढ़ गए।

ठीक साढ़े नौ बजे आवाज़ आई। बेटा, दरवाज़ा खोल। माँ की आवाज़ थी, बिल्कुल वैसी, वही खिंचाव जो थकान में आ जाता है, जब दिन भर की सिलाई के बाद गला बैठ जाता है। अशीष उठा, कुंडी की तरफ हाथ बढ़ाया। तभी टेबल पर रखा मोबाइल बजने लगा। माँ की कॉलर ट्यून, वही गाना जो पिछले तीन महीने से नहीं बदला था, कोई पुरानी फिल्म का।

अशीष का हाथ कुंडी पर रुक गया। कान फोन की तरफ मुड़ा। दो जगह से एक ही आवाज़ नहीं आ सकती, ये बात उसे उसी पल समझ आ गई, दिमाग में नहीं, हाथ में, जो कुंडी पर जमकर रुक गया था। उसने फोन उठाया। माँ बोल रही थी, वही रोज़ वाली दो मिनट की बात, खाना, पढ़ाई, सो जाना। दरवाज़े के बाहर वाली आवाज़ अब भी बुला रही थी, थोड़ी और नरम, थोड़ी और करीब, जैसे कान के पास आ गई हो।

गुरुजी उस वक्त बरामदे में थे, बीड़ी का धुआँ छत की तरफ फेंकते हुए। उन्हें भी सुनाई दिया, दरवाज़े की खटखट और अशीष का फोन एक साथ बजना। वो दौड़े, चप्पल एक बार फिसली, दीवार पकड़कर संभले। दरवाज़े के पास पहुँचे तो देखा, चूने की लाइन बारह पर चौदह हो चुकी थी। एक लाइन ज़्यादा। जो उन्होंने नहीं खींची थी।

अशीष ने दरवाज़ा नहीं खोला। न उस रात, न कभी उसके बाद। गुरुजी ने बाकी लड़कों को हिदायत दे दी, रोज़ सुबह अपनी लाइन गिनना, अपने हाथ से खींची गिनती याद रखना, और फर्क आए तो दरवाज़ा मत खोलना चाहे जो भी आवाज़ हो, माँ की हो, बाप की हो, कोई भी।

मैं जब मामा के लड़के से मिलने गया, वो लाइन अब भी वहाँ थी, बारह नंबर के दरवाज़े पर। चौदह लाइनों में से चौदहवीं थोड़ी धुंधली हो गई थी, बाकी सबसे टेढ़ी, जैसे किसी ने नीचे से ऊपर की तरफ खींची हो, अंदर से नहीं, बाहर से। मामा के लड़के ने फल का डिब्बा एक तरफ रख दिया और बोला कि वो लाइन गिनने से पहले अब मोबाइल का टाइम देख लेता है, हर सुबह, बिना नागा।

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