Skip to main content
HorrorGod

नरसिंहपुर हाईवे के ढाबे का सातवां नियम

0 posts · Joined Aug 13, 2026

3 min read11 views0 replies
Listen to this storyDownload MP3 · 4:15

नहीं, वो सियार नहीं था। ये पहले साफ़ कर दूं, क्योंकि मेरे मामा भी यही समझते हैं, और मैं उन्हें कभी टोकता नहीं। पर जो चीज़ मैंने ढाबे पर रहकर देखी, तीन साल रहा वहां... नहीं, ठीक से याद करूं तो ढाई साल ही हुए थे, बरसात से बरसात तक — वो सियार नहीं थी।

ढाबा नरसिंहपुर से गादरवारा वाले हाईवे पर है, बिल्कुल वो जगह जहां रोड सुनसान हो जाती है और स्ट्रीट लाइट खत्म हो जाती है। मालिक रामनिवास चाचा थे, अब नहीं हैं। जब मैं रात की शिफ्ट करता था तो उन्होंने मुझे कुछ नियम रटवाए थे। हर बार तवे के पास खड़े होकर एक ही लहजे में कहते, बेटा ये मत सोचना कि ये अंधविश्वास है, ये सुरक्षा है। उनकी दुकान की घंटी पीतल की थी, पड़ोस के मंदिर से मिलती-जुलती, और वो घंटी की डोर कभी नई नहीं करवाते थे — क्यों, ये मैंने कभी नहीं पूछा।

एक: रात को बारह बजे के बाद हाईवे पर कोई मरा हुआ जानवर दिखे तो उसे छूना नहीं। कुत्ता हो, गाय हो, कुछ भी, बस उसके पास से ढाबे की तरफ मुंह करके चल दो।

दो: सुबह पांच बजे जब पहला ट्रक गुजरे, अगर वो जानवर वहां से गायब हो चुका हो तो किसी को मत बताना कि तुमने रात को देखा था। बस दुकान खोल लेना, चाय चढ़ा देना।

तीन: कभी गिनती मत करना कि रात में कितनी लाशें आईं और सुबह कितनी बचीं। रामनिवास चाचा ने खुद कहा था, गिनती करने वाला आदमी नींद में चलने लगता है।

चार: अगर आधी रात को दुकान के पीछे से चबाने की आवाज़ आए, तो पीछे मुड़कर मत देखना। कहते थे, वो जो भी है, उसे भूखे को खाते हुए देखना ठीक नहीं, चाहे वो जानवर ही क्यों न हो।

पांच: अगर कोई तुम्हारा नाम पुकारे, और आवाज़ ठीक चाचा जैसी हो, तो पहले दुकान की घंटी बजा के देखो। असली चाचा घंटी सुनते ही जवाब देते थे, आधी नींद में भी। जो जवाब न दे, वो चाचा नहीं है।

छह: अगर वो आवाज़ फिर भी दरवाजे तक आ जाए, तो उसे अंदर मत बुलाना, चाहे वो कितनी भी बीमार या थकी हुई लगे। पिशाच अंदर बुलाए बिना दहलीज़ नहीं लांघता — ये बात रामनिवास चाचा ने कसम खाकर कही थी, हाथ पर हाथ रखकर, जैसे कोर्ट में गवाही दे रहे हों।

सातवां नियम चाचा ने कभी पूरा नहीं बताया। बस इतना कहते, सातवां नियम तब समझ आएगा जब तुम खुद उस चीज़ को खाते हुए देख लोगे, और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। एक बार पूछा तो हंस दिए, बोले चाय ठंडी हो रही है, पहले वो देख।

पिछले महीने की बात है। रात के दो बजे थे, हाईवे पर एक कुत्ता कुचला पड़ा था, ठीक ढाबे से पचास कदम पहले। मैंने नियम एक याद रखा, छुआ नहीं। अंदर आकर बैठ गया, तवे पर आटा सेकता रहा और बार-बार घड़ी देखता रहा। रेडियो पर कोई पुराना गाना बज रहा था, वही जो चाचा को पसंद था, और मैंने वॉल्यूम कम नहीं किया, ऐसा लगा मानो कमरे में कोई और भी सुन रहा हो।

साढ़े तीन बजे चबाने की आवाज़ शुरू हुई। मैंने पीछे नहीं देखा। बर्तन धोता रहा। हाथ कांप रहे थे, पानी की धार टूटती-जुड़ती रही, पर मुड़ा नहीं।

पांच बजे पहला ट्रक गुजरा। मैं बाहर गया देखने। कुत्ता वहां नहीं था। सड़क साफ़, बस डामर पर एक गीला दाग, जिस पर एक चींटी की लाइन बन चुकी थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

तभी दुकान के पीछे से आवाज़ आई, ठीक रामनिवास चाचा जैसी, थकी हुई,

No ratings yetSign in to rate

Replies0 replies

No one has dared to reply yet.

Only members can reply to this story.