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HorrorGod

पंप के पास वाली पायल

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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यह कहानी मध्य प्रदेश के एक छोटे कस्बे जैसे बड़वानी के आसपास के किसी गांव में सेट है, जहां घर के पीछे हैंडपंप और पीपल का पेड़ आम दृश्य हैं।

हैंडपंप का हैंडल उल्टा टंगा था, नीचे की तरफ, जैसे किसी ने ज़बरदस्ती मोड़कर छोड़ दिया हो। मामा के घर के पीछे वाला वही पुराना पंप, जिस पर मैं बचपन में कुल्ला करता था। शादी की तैयारी में सब लगे थे, तंबू वाले लाइट लगा रहे थे, और मैं थककर पानी पीने पीछे आया तो हैंडल देखकर रुक गया। पापा को बताया तो बोले, "किसी बच्चे ने मरोड़ दिया होगा, चल हलवाई को बोल कड़ाही उतार दे।"

रात के दस बजे तक बारात वाले पक्ष का फ़ोन आ चुका था, कल सुबह नौ बजे निकलेंगे। घर में बिजली दो बार गई, जनरेटर वाला मुन्ना दोनों बार भागकर आया, स्विच घुमाया, फिर वापस अपनी चारपाई पर चला गया, बीच में एक बार उसका कुत्ता भी भौंकते-भौंकते चुप हो गया, किसी ने ध्यान नहीं दिया। छत पर औरतें गीत गा रही थीं, कोई पुराना ब्याह वाला गीत जिसके बोल मुझे याद नहीं थे, सिर्फ धुन याद रह गई। मेरी बुआ ने कहा, "रात को पंप के पास मत जाना। नई बहू आने वाली है घर में, कुछ ऊटपटांग मत करना आज की रात।" मैंने हंस के टाल दिया।

बारह बजे के करीब मुझे प्यास लगी। घर के अंदर वाले माठे का पानी खत्म हो चुका था, सब लोग या तो सो रहे थे या छत पर थे। लालटेन उठाकर पीछे गया। हैंडपंप की टोंटी के नीचे थोड़ी कीचड़ जमी थी, वैसे वहां हमेशा सूखा ही रहता है, किसी ने दो साल से इस्तेमाल नहीं किया, नया नल लग गया था बरामदे में। पर आज नीचे गीली मिट्टी में एक पायल का निशान था, पूरा पंजा नहीं, बस एड़ी की तरफ का हिस्सा, और वो भी उल्टा घूमा हुआ, जैसे कोई पीछे की तरफ चल रहा हो।

लालटेन नीचे झुकाई तो पास वाले पीपल के नीचे एक औरत खड़ी थी। लाल जोड़ा, हाथों में मेहंदी अभी गीली सी चमक रही थी, और चूड़ियां इतनी थीं कि हिलते ही आवाज़ पूरे आंगन में सुनाई देती। मैंने सोचा शायद पड़ोस की कोई भाभी है जो जल्दी तैयार हो गई। पूछा, "आप यहां क्यों खड़ी हैं? अंदर आइए ना, ठंड लग रही होगी।"

उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस मुस्कुरा दी। फिर कदम बढ़ाया, मेरी तरफ नहीं, पंप की तरफ, पर उसके पैर घुटनों से उलटे मुड़े हुए थे, तलवे मेरी ओर, एड़ी उस तरफ जहां वो जा रही थी। पायल की आवाज़ ठीक वैसी ही थी जो निशान मैंने अभी देखा था, छम, फिर एक रुकावट, फिर छम, उल्टे कदम की लय में।

मेरे मुंह से कुछ नहीं निकला। लालटेन हाथ से छूट गई, और मैं भागकर बुआ के कमरे तक पहुंचा, दरवाज़ा पीटता रहा जब तक किसी ने खोला नहीं। बुआ ने मेरी हालत देखी और बिना कुछ पूछे हनुमान चालीसा शुरू कर दी। मैं दीवार से टिककर सांस लेता रहा, इतना कि छाती में दर्द होने लगा।

सुबह जब हलवाई कड़ाही धोने पंप के पास गया तो हैंडल फिर सीधा टंगा मिला। गीली मिट्टी में वो निशान अभी भी था, धूप में सूखकर भी अपनी उल्टी शक्ल के साथ, ठीक हैंडपंप की टोंटी से लेकर पीपल तक जाता हुआ। किसी ने उसे मिटाने की ज़रूरत नहीं समझी, दो दिन बाद बारात की गाड़ियों के टायरों ने ही उसे रौंद दिया।

"Hand pump porch 1875 farmhouse" by Carol M Highsmith is marked with CC0 1.0. To view the terms, visit https://creativecommons.org/publicdomain/zero/1.0/.

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