Skip to main content
HorrorGod

मुलताई हाईवे का ढाबा

0 posts · Joined Aug 13, 2026

3 min read61 views0 replies
Listen to this storyDownload MP3 · 4:24

नेशनल हाईवे 47 पर मुलताई (मध्य प्रदेश) के बाहर एक काल्पनिक ढाबे में सेट, जहाँ हाईवे किनारे सड़क-हादसों की सफ़ाई की लोककथाएँ आम हैं।

सोनू ने ढाबे के आगे चूने की लाइन देखी और रुक गया। आधी अधूरी थी, दायीं तरफ़ तंदूर तक जाकर बीच में टूट गई थी, जैसे किसी ने बीच रास्ते में ही डिब्बा फेंक दिया हो। मालिक रामलाल सुबह ही निकल गए थे, बगल के गाँव में भांजे की शादी में — या भांजी की, सोनू को ठीक याद नहीं, रामलाल ने रास्ते में कुछ जल्दी में बताया था — और जाते-जाते बस इतना कह गए थे, "लाइन खींचना मत भूलना, अंधेरा होते ही।" सोनू ने सोचा, कल पूरी कर दूँगा, अभी तो ग्राहक बैठे हैं।

रात के दस बजे तक दो-चार ट्रक रुके। ड्राइवरों ने रोटी-सब्ज़ी खाई, चाय पी, फिर हाईवे पर उतर गए। साढ़े ग्यारह बजे, या ग्यारह ही रहे होंगे, सोनू ने घड़ी नहीं देखी थी, सड़क सुनसान हो गई। नेशनल हाईवे 47 पर मुलताई से आगे यह ढाबा अकेला ही खड़ा था, दोनों तरफ़ खेत, बीच में सड़क की काली पट्टी। सोनू बर्तन माँज रहा था जब तेज़ हॉर्न सुनाई दिया, फिर एक धम्म, फिर कुछ नहीं। वह बाहर भागा। सड़क किनारे एक कुत्ता पड़ा था, पिछला पैर अजीब कोण में मुड़ा हुआ, ट्रक कब का जा चुका था।

सोनू को यह नया नहीं लगा। हाईवे पर रोज़ कुछ न कुछ कटता था — कुत्ता, बकरी, कभी-कभी नीलगाय का बच्चा। अजीब बात यह थी कि सुबह जब पहला ट्रक निकलता, सड़क साफ़ मिलती। मालिक कहते थे नगरपालिका वाले रात में उठा ले जाते हैं। सोनू ने कभी पूछा नहीं कि नगरपालिका की गाड़ी रात के किस पहर आती है। उसकी अम्मा का फ़ोन आया था शाम को, बकरी बेचने की बात पर, वह अलग किस्सा था, बाद के लिए।

वह भीतर जाकर फिर बर्तन में लग गया, पर कान बाहर ही अटके रहे। कोई आवाज़ आई, जैसे बोरी घसीटी जा रही हो, धीमी, रुक-रुककर। खिड़की से झाँका तो कुछ दिखा — लंबा, इतना पतला कि हड्डियों पर बस खाल चढ़ी लगे, चार हाथ-पैर ज़मीन पर टिकाए, कुत्ते को मुँह से खींच रहा था। सिर सामान्य आदमी जितना, पर गर्दन दोगुनी लंबी, जैसे किसी ने रबड़ की तरह खींच दी हो। सोनू की हथेली में साबुन का बुरादा सूख चुका था, वह वहीं जमा खड़ा रहा, बर्तन हाथ से नहीं छूटा, पर साँस उसने कब की रोक ली थी, उसे भी पता नहीं चला।

वह चीज़ चूने की लाइन तक आकर रुक गई। ठीक उस जगह जहाँ लाइन पूरी थी, वहाँ से आगे नहीं बढ़ी, बस सिर घुमाकर ढाबे की तरफ़ देखती रही, नथुने फुलाकर, जैसे कोई गंध पहचान रही हो।

फिर मुड़ी, कुत्ते को लेकर उस पतली पट्टी से गुज़री जहाँ लाइन टूटी थी, ठीक तंदूर के पास से, और भीतर की तरफ़ एक कदम बढ़ आई।

सोनू की चप्पल दरवाज़े के बाहर पड़ी थी, वहीं जहाँ वह हमेशा उतारता था तंदूर सेंकते वक़्त। उस चीज़ की उँगलियाँ, हर एक जोड़ पर एक गाँठ ज़्यादा जैसे, चप्पल के फ़ीते पर आ टिकीं। सोनू का गला बंद हो गया, आवाज़ अंदर ही कहीं फँसकर रह गई। उसने बस इतना किया कि दरवाज़े की कुंडी अंदर से चढ़ा दी, धीरे से, जैसे आवाज़ भी न हो।

बाहर घसीटने की आवाज़ रुक-रुककर सुबह तक चलती रही। ठीक पौने पाँच बजे, दूर से पहले ट्रक का हॉर्न सुनाई दिया, वही घंटी जैसा डीज़ल हॉर्न जो रोज़ इसी वक़्त आता। घसीटने की आवाज़ अचानक बंद हो गई।

सोनू ने दरवाज़ा खोला। सड़क साफ़ थी, कुत्ते का कोई निशान नहीं, खून तक धुला-धुला। उसकी चप्पल वहीं पड़ी थी, ठीक चूने की टूटी लाइन के ऊपर, फ़ीता आधा चबा हुआ, और उस पर दो गीली, लंबी उँगलियों के निशान अभी तक सूखे नहीं थे।

No ratings yetSign in to rate

Replies0 replies

No one has dared to reply yet.

Only members can reply to this story.