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HorrorGod

जो बचे उसे जलाना है, फेंकना नहीं

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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चित्रकूट-बांदा हाईवे पर काल्पनिक ढाबा, क्योंकि रात-भर चलने वाले ट्रक ढाबों की जली राख और बचा खाना असली इलाकों में आम टेक्स्चर है।

साहब, मैं आपको वही बताऊँगा जो नंदू भैया ने मुझे सिखाया था। जब भी थाली में से कुछ बचे, चाहे एक रोटी का टुकड़ा ही क्यों न हो, उसे पीछे वाले गड्ढे में जलाना है। कुत्तों को मत डालना, नाली में मत बहाना, बस जलाना। मैंने कभी पूछा नहीं क्यों। कोई बड़ा आदमी दस साल से एक बात कहता आए तो नया लड़का बस सिर हिला देता है, ज़्यादा सवाल नहीं करता।

ये चित्रकूट रोड पर 'नंदू ढाबा' है, बांदा से करीब बाईस किलोमीटर पहले, जहाँ ट्रक वाले रात भर रुकते हैं। मैं वहाँ तीन साल — या शायद सवा तीन साल, ठीक याद नहीं — बर्तन धोने और तंदूर सम्भालने का काम करता था। रात की शिफ्ट मेरी थी, बारह बजे से सुबह पाँच तक। ढाबे के पीछे एक गड्ढा है, ईंटों से घिरा हुआ, वहीं जलाना पड़ता था। नंदू भैया खुद रोज रात को आकर देख जाते थे कि गड्ढे में राख है या नहीं। एक बार पूछा था मैंने, इतनी ठंड में इतनी दूर तक चक्कर क्यों लगाते हो भैया, उन्होंने बस इतना कहा कि पुराना हिसाब है, तुम्हें नहीं समझोगे।

जनवरी की बात है। ठंड बहुत थी, कोहरा इतना कि हाईवे पर हेडलाइट भी दस फीट आगे नहीं दिखती थी। उस रात एक बारात की बस रुकी थी, चालीस-पैंतालीस लोग, बहुत खाना बचा — दाल, पूरी, कोई हलवा भी था शायद, या खीर, ठीक याद नहीं आ रहा। मैं थका हुआ था। सोचा सुबह जला दूँगा, अभी बर्तन धोकर सो जाता हूँ। बचा हुआ खाना बड़े पतीलों में ढककर रख दिया, गड्ढे में नहीं डाला।

रात करीब दो बजे नींद खुली किसी आवाज़ से। चम्मच खड़खड़ाने जैसी आवाज़, जैसे कोई थाली में हाथ डाल रहा हो। मैं ढाबे की पिछली कोठरी में सोता था, दीवार पतली थी, रसोई से लगी हुई। सोचा कोई कुत्ता घुस आया होगा। उठकर देखा तो रसोई का दरवाज़ा खुला था। मैंने खुद बंद किया था, यह मुझे पक्का याद है, कुंडी भी चढ़ाई थी।

अंदर एक आदमी बैठा था, पतीले के पास, पीठ मेरी तरफ। कद छोटा, कंधे उठे हुए, जैसे कोई बहुत भूखा आदमी झुककर खा रहा हो। मैंने आवाज़ दी, कौन है, और वो रुक गया। हाथ पतीले में डूबे रहे, हिले नहीं। हलवे या खीर की गंध के बीच एक और गंध आ रही थी, गीली मिट्टी जैसी, जैसे कब्रिस्तान से सीधे उठकर आया हो कोई।

मैं दो कदम पीछे हट गया। उसने सिर घुमाया, पूरा नहीं, बस थोड़ा, और मैंने देखा कि गाल की हड्डी बाहर को निकली हुई थी, चमड़ी उतनी ही थी जितनी ढाँकने भर के लिए काफी हो। आवाज़ आई, बहुत हल्की, जैसे किसी बच्चे ने खाँसते हुए बोला हो,

by Sitikantha kheti via Own work — CC BY 3.0

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