मैंने वो घंटी नहीं बजाई थी।
यह बात मैं खुद से दोहरा रहा था, स्कूल के बरामदे में बैठा, हाथ में टॉर्च लिए जो आधी बैटरी पर टिमटिमा रही थी। रात के साढ़े ग्यारह रहे होंगे, या पौने बारह — घड़ी देखने का ख़याल भी तब आया जब बहुत देर हो चुकी थी। छतरपुर के उस कोने में लाइट पहले ही जा चुकी थी, रोज़ की तरह, और बिजली विभाग वाले हर बार यही बहाना देते थे कि ट्रांसफार्मर जल गया।
बोर्ड एग्ज़ाम के पेपर स्टोर रूम में रखे थे। स्कूल के बूढ़े चौकीदार भोला काका ने उस रात ड्यूटी से साफ मना कर दिया था। बुखार बताया उन्होंने, फोन पर आवाज़ भी सचमुच भर्रायी हुई लग रही थी, लेकिन मुझे पता था असली वजह क्या थी। मैदान के कोने वाला वो पीपल।
पिछले तीन साल से हेडमास्टर साहब उस पेड़ को कटवाने की बात करते आ रहे थे। हर बार बजट पास होता, दो-चार बार आदमी कुल्हाड़ी लेकर भी आए, और हर बार भोला काका किसी न किसी बहाने से आड़े आ जाते। एक बार तो उन्होंने पंचायत के सामने रो कर कहा था कि पेड़ मत काटो, बदले में कुछ और मांग लो। लोग हँसे थे, मुझे याद है, और भोला काका उस दिन के बाद कई हफ्तों तक किसी से ठीक से बात नहीं करते थे। वो कहानी मुझे किसी और दिन याद आती, आज नहीं — आज तो बस घंटी की बात दिमाग में अटकी हुई थी।