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HorrorGod

ब्याज वाली अम्मा के घर के नियम

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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पहले मुझे लगा कोई सिक्का गिरा है, वही टन-टन वाली आवाज़, जैसे कोई पैसा गिनते हुए थाली में डाल रहा हो। फिर ध्यान से सुना तो समझ आया, ये सिक्के की आवाज़ नहीं थी। चूड़ी की थी। एक हाथ में पहनी सात-आठ चूड़ियाँ जब हिलती हैं, वैसी आवाज़। छतरपुर की पुरानी बस्ती की उस गली में रात के साढ़े दस बजे और कोई आवाज़ नहीं होती थी, बस यही।

हमारी गली में सब लोग सावित्री मौसी से पैसे उधार लेते थे। उनके पति गुज़र गए थे बरसों पहले, ब्याज का धंधा वो अकेली चला रही थीं, घर गली के आख़िरी मोड़ पर था, नीम के पेड़ के नीचे, दरवाज़ा हमेशा भेड़ा हुआ। दिन में हर कोई वहाँ जाता, पैसे लेने, लौटाने, ब्याज गिनने के लिए। रात में कोई नहीं जाता। ये कोई लिखा हुआ नियम नहीं था, बस ऐसा ही चलता आया था, बरसों से। मेरी अम्मा ने मुझे एक बार समझाया था, टुकड़ों में, जैसे कुछ याद करके गिन रही हों। बीच में एक बार रुकीं, कुछ बोलने को हुईं, फिर बोली छोड़ो, बाद में बताऊँगी।

एक, दिन ढलने से पहले उनका पैसा लौटा देना, चाहे ब्याज पूरा हो या न हो।

दो, अगर रात में उनके दरवाज़े से चूड़ियों की आवाज़ सुनाई दे, समझ लेना कोई पैसे गिन रहा है। वहाँ से गुज़र जाना, रुकना नहीं।

तीन, अगर आवाज़ पीछे आने लगे, गली के मोड़ तक साथ चले, तो पलट कर मत देखना। मौसी का चेहरा पीछे से बहुत सुंदर लगता है, इसीलिए देखना मना है।

चार, अगर वो नाम लेकर बुलाए, तो जवाब मत देना। असली सावित्री मौसी कभी नाम लेकर नहीं बुलातीं, वो बस खखार कर आवाज़ देती हैं, गला साफ़ करने जैसा।

पाँच, अगर पैर दिखें और वो उल्टे लगें... अम्मा यहाँ रुक गई थीं। हाथ में पकड़ा प्याज़ छिलते-छिलते नीचे रख दिया था उन्होंने, फिर बोलीं, नहीं, ये तो चुड़ैल की निशानी है, मौसी तो जिंदा हैं। ज़िंदा औरतें भी कुछ कर सकती हैं, बेटा। मरना ज़रूरी नहीं है डायन बनने के लिए।

छह... छह नंबर पर अम्मा चुप हो गई थीं। सिर्फ इतना बोलीं कि जो भी उधार ले, वो कभी रात में मौसी के घर न जाए, चाहे कितना भी ज़रूरी हो, चाहे बुखार में मरता हो कोई। मैंने तब पूछा नहीं, अब लगता है पूछ लेना चाहिए था।

मुझे एक रात जाना पड़ा। पिताजी की दवा का पैसा कम पड़ गया था और दुकान बंद हो रही थी। अम्मा ने मुझे भेजा, बोली जल्दी जाना जल्दी आना, दरवाज़े पर से ही पैसे ले लेना, अंदर मत जाना। जाते वक़्त उसने मेरी कलाई पर हल्दी का धागा भी बाँध दिया था, बिना कुछ कहे, फिर वो धागा मुझे पूरी रात याद रहा, बाद में कभी उसका ज़िक्र नहीं हुआ, न मैंने किया न उसने।

मैं गया। नीम के पेड़ के नीचे से गुज़रते वक़्त चूड़ियों की आवाज़ सुनाई दी, बहुत पास से, जैसे मेरे ही कान के बगल में कोई हाथ हिला रहा हो। मैंने पीछे नहीं देखा। दरवाज़ा भेड़ा हुआ था, हमेशा की तरह। मैंने खटखटाया। अंदर से किसी ने खखारा, गला साफ़ किया, और दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, बस इतना कि एक हाथ निकल सके।

जो हाथ बाहर आया, नोट पकड़ाने के लिए, उसमें सात चूड़ियाँ थीं, सारी हरी, सारी नई। कलाई पर पुरानी सिलाई के निशान जैसा कुछ था, जैसे किसी ने खाल को दोबारा जोड़ा हो, धागे से।

मैंने पैसे पकड़े और भागा, पूरे रास्ते पीछे मुड़कर नहीं देखा। घर पहुँचकर मुट्ठी खोली तो नोट के साथ एक हरी चूड़ी का टुकड़ा भी निकला, टूटा हुआ, अभी भी गरम।

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