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HorrorGod

रस्सी हर सुबह गीली मिलती है

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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मैं हर सुबह पहला काम यही करता हूँ। नल खोलने से पहले, चाय की पतीली चढ़ाने से पहले, पिछवाड़े जाकर उस पुराने कुँए की रस्सी हाथ में लेता हूँ। गीली मिले तो उस दिन कुएँ की तरफ पीठ करके सोता हूँ, और शाम का पानी बाजू वाले के हैंडपंप से भरता हूँ। किसी ने सिखाया नहीं यह मुझे, पापा ऐसा करते थे, बस अब मैं करता हूँ।

कुआँ बीस साल पहले भर दिया गया था, या उन्नीस, ठीक याद नहीं, सिवनी के इस मोहल्ले में जब नगर पालिका ने सबको बोरिंग करवा दी थी। ईंट-मिट्टी डालकर ऊपर तक भर दिया, बस एक लोहा का हुक दीवार में छोड़ दिया गया, पता नहीं किसलिए। उसी हुक में एक पुरानी रस्सी बंधी रहती है, नीचे मिट्टी में धँसी, जिसका सिरा अब कहीं नहीं जाता। बगल वाले शर्मा जी का रेडियो हर सुबह छह बजे भजन बजाना शुरू करता है, ठीक उसी वक्त जब मैं पिछवाड़े में होता हूँ।

सोमवार की सुबह रस्सी गीली मिलती है, पर हल्की, जैसे रात को ओस पड़ी हो। छूता हूँ, उंगलियाँ पोंछता हूँ, भूल जाता हूँ। माँ रसोई से पूछती है, "आज खिचड़ी बनेगी क्या," मैं कहता हूँ "जैसी मर्ज़ी," और दिन चल पड़ता है। हुक के नीचे मिट्टी थोड़ी धँसी दिखती है, बस इतना।

मंगलवार को रस्सी पूरी भीगी मिलती है, इतनी कि हथेली से पानी टपकता है। दो कदम पीछे हट जाता हूँ। मिट्टी में एक गड्ढा बन गया है, गोल, जैसे किसी ने अंदर से खुरचा हो। माँ फिर पूछती है खिचड़ी वाली बात। इस बार जवाब नहीं देता, अंदर आकर हाथ धोता हूँ, तीन बार, साबुन से, फिर भी लगता है उंगलियों में कुछ लगा रह गया है। रात को नल की टोंटी बंद करना भूल जाता हूँ, सुबह देखता हूँ बाल्टी भर चुकी है और फर्श पर पानी फैला हुआ है।

बुधवार को जानबूझकर देर से जाता हूँ, सूरज निकल आने के बाद। रस्सी को हाथ लगाने से पहले ही दिख जाता है, वो सिर्फ गीली नहीं, उससे बूँदें अभी भी टपक रही हैं, जैसे किसी ने अभी छोड़ी हो। हुक के नीचे का गड्ढा अब इतना गहरा है कि उसमें कलाई तक समा जाए। मिट्टी की महक बदल गई है, बरसाती नहीं, कुछ और, तालाब की तली जैसी।

इस बार रस्सी नहीं छोड़ता। हाथ में पकड़े रहता हूँ, सोचता हूँ खींचूँ, देखूँ नीचे क्या है। तभी रस्सी हल्की सी हिलती है, जैसे कोई नीचे से उसे थामे बैठा हो, कोई जो बस इतना पूछना चाहता हो कि आज पानी मिलेगा या नहीं। हाथ छुड़ाने की कोशिश करता हूँ, पर रस्सी उंगलियों के इर्द-गिर्द ऐसे लिपट गई है जैसे उसे पहले से पता था मैं आऊँगा। पीछे खींचता हूँ, ज़ोर से, और गिर पड़ता हूँ, पीठ के बल, आँगन की मिट्टी में। शर्मा जी का रेडियो अब भी बज रहा है।

रस्सी मेरी कलाई के चारों ओर कसी हुई है, गीली, ठंडी, और उसका दूसरा सिरा अब भी उस गड्ढे के अंदर, अंधेरे में, हिल रहा है।

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