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HorrorGod

रात की सफाई

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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नहीं, मैं झूठ नहीं बोल रही। मैंने कुछ नहीं देखा, बस सुना है।

चतरपुर के जिला अस्पताल में मैटरनिटी वार्ड की नाइट ड्यूटी पर लगते ही सिस्टर कमला मुझे एक कागज़ थमाती हैं, हाथ से लिखा हुआ, कोनों से मुड़ा-तुड़ा। बोलती हैं, पढ़ लो, याद रख लो, फाड़ना मत। वैसे उनकी लिखावट इतनी खराब है कि पहली बार में तीन लाइनें मुझे समझ ही नहीं आईं, दूसरी बार पढ़ी तब जाकर बात बनी।

एक: रात दस बजे के बाद कॉरिडोर में सफाई करने कोई स्वीपर नहीं आता। रोस्टर में नाम ही नहीं है किसी का। झाड़ू की आवाज़ सुनाई दे तो दरवाज़ा बंद रखना, बाहर मत झांकना।

दो: कोई नई माँ रोए और कहे कि कोई औरत उसके बच्चे को गोद में लेने आई थी, उसे डांटना मत। बस चेक कर लेना कि बच्चा पालने में है या नहीं। ज़्यादातर होता है।

तीन: वार्ड नंबर सात के पास वाला नल कभी बंद मत छोड़ना। पानी टपकता रहे तो ठीक है, वो आवाज़ अच्छी है। बंद हो जाए तो दूसरी आवाज़ सुनाई देती है।

चार: अगर तुम्हें अपने पीछे झाड़ू की सरसराहट सुनाई दे और मुड़ने पर कोई सफाई करती औरत दिखे, सफेद साड़ी में, सिर झुकाए, उसे कुछ मत बोलना। उसकी परछाई फर्श पर उल्टी पड़ती है, चाहे लाइट किसी भी तरफ से आ रही हो। बस मत देखना।

पांच: नई नर्स को ये मत बताना कि दो साल पहले वार्ड सात में एक लड़की की डिलीवरी में मौत हुई थी। गाँव से आई थी, ससुराल वालों ने अस्पताल के बाहर ही छोड़ दिया था, बच्चा भी नहीं बचा। बताने से डर लगता है, डर लगने से हाथ कांपते हैं, और यहाँ हाथ कांपना ठीक नहीं।

छह: वो औरत तुमसे कुछ मांगे — बच्चा, दूध, कुछ भी — चुप रहना। हिलना मत। साँस भी धीरे लेना।

सात: उसके पैर मत देखना। बस मत देखना।

आठ नंबर नहीं है। कमला ने वो लाइन काट दी है, स्याही से इतनी बार कि कागज़ वहाँ से फटने ही वाला है। मैंने पूछा था क्यों। उसने कहा, आठवां नियम खुद ही टूट जाता है, चाहे तुम कुछ भी करो, तो लिखने का क्या फायदा। ये कहकर वो चाय बनाने चली गई थी, जैसे बात खत्म हो गई हो।

आज रात साढ़े ग्यारह बजे मैं वार्ड सात के पास से गुज़रती हूँ, फाइलें हाथ में। नल टपक रहा है, ठीक वैसे जैसा होना चाहिए। कॉरिडोर की ट्यूबलाइट में से एक टिमटिमा रही है, मंगलवार से यही हाल है, किसी ने ठीक नहीं करवाया। लाइट वाले भैया कल आने वाले थे, आए नहीं।

झाड़ू की आवाज़ शुरू होती है मेरे पीछे से। धीमी, लयबद्ध, जैसे कोई बरसों से यही काम कर रही हो।

मैं नियम नंबर चार याद करती हूँ। मुड़ती नहीं। साँस रोकती हूँ, फिर छह वाला नियम भी याद आता है, तो साँस और धीमी कर लेती हूँ। पैरों की तरफ नहीं देखूँगी, ये मैंने खुद तय कर लिया है, कमला के कहने से पहले ही।

फाइल हाथ से छूट जाती है। कागज़ बिखर जाते हैं फर्श पर, और मुझे उन्हें उठाना ही पड़ता है।

नीचे झुकते हुए दिखती है सफेद साड़ी की झालर, फर्श से एक इंच ऊपर, हिलती नहीं, बस लटकी हुई। उसके नीचे, टाइल्स पर, गीली झाड़ू के निशान — दो पैरों के, एड़ी आगे की तरफ, पंजे पीछे।

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