Skip to main content
HorrorGod

महेश्वर मेले की चूड़ियाँ ठंडे हाथों से गरम बिकीं

0 posts · Joined Aug 13, 2026

3 min read15 views0 replies
Listen to this storyDownload MP3 · 4:02

महेश्वर, मध्य प्रदेश के नर्मदा घाट मेले में सेट, जहाँ कार्तिक मेला असल में हर साल लगता है और चूड़ी-मेहंदी की छोटी दुकानें घाट की सीढ़ियों तक फैलती हैं।

नहीं साहब, मैंने कोई चूड़ी नहीं तोड़ी। ये पहली बात साफ़ कर दूँ, क्योंकि आप जब से बैठे हैं, बार-बार यही पूछ रहे हैं। चूड़ी मैंने नहीं तोड़ी, वो तो उतरते वक़्त खुद टूट गई थी। बाकी जो कुछ हुआ, वो मेरा नहीं, मेरी बुआ का किस्सा है। मैं तो बस उनका बताया हुआ दोहरा रहा हूँ, और सच कहूँ तो पूरा यकीन मुझे भी नहीं है।

ये बात महेश्वर के नर्मदा किनारे वाले मेले की है, जो कार्तिक में लगता है, या हो सकता है अगहन रहा हो, बुआजी खुद ठीक-ठीक महीना नहीं बताती। बुआजी अपनी बेटी रीना के साथ गई थीं, दो साल पहले। घाट की सीढ़ियों से थोड़ा ऊपर, बरगद के पास, चूड़ी वाले की एक अलग-सी दुकान लगी थी। बाकी सब चूड़ी वालों के बीच में यही एक थी जिस पर भीड़ नहीं थी। लोग बचते हुए निकल रहे थे, जैसे रास्ता बदल कर जाना ज़्यादा आसान हो। बुआजी को उस वक़्त ये अजीब नहीं लगा। रीना को लाख की लाल चूड़ियाँ पसंद आ गई थीं, बारह की सेट, और दुकान वाली ने कहा तेरहवीं फ्री दे रही हूँ, बिटिया की कलाई भरी रहे।

बुआजी कहती हैं वो औरत ज़्यादा बूढ़ी नहीं थी, बस चेहरा ऐसा था जैसे कभी हँसी न हो। हाथ जब चूड़ी पहनाने को उठे, तो बुआजी को ठंडक महसूस हुई, बर्फ की सिल्ली छू गई हो जैसे। नवंबर की शाम थी, फिर भी उस औरत के हाथ ऐसे थे जैसे अभी-अभी कुएँ के पानी से निकाले हों। पर चूड़ियाँ गरम थीं। रीना की कलाई पर बैठते ही उसने कहा था, माँ ये गरम क्यों है, अभी तो लाख की है, धूप में भी नहीं रखी थी। बुआजी ने हँसकर टाल दिया, बोलीं शायद औरत की गोद में रखी होंगी।

रात को रीना सो नहीं पाई। कहती रही कलाई में जैसे कोई नब्ज़ चल रही हो, चूड़ियों के अंदर से, उसकी अपनी नब्ज़ से अलग एक धड़कन। बुआजी ने ध्यान नहीं दिया, थकी हुई थीं, मेले भर पैदल चली थीं, पैर सूजे हुए थे। सुबह उठीं तो देखा रीना की कलाई पर बारह की जगह तेरह चूड़ियाँ थीं, और तेरहवीं का रंग बाकी से हल्का काला।

तीन दिन ऐसे ही निकले। रीना का हाथ भारी रहने लगा, जैसे किसी ने कलाई पकड़ रखी हो, और वो पकड़ रात को ज़्यादा मज़बूत हो जाती। चौथी रात बुआजी ने खुद जागकर देखा। बेटी की कलाई से हल्की सी आवाज़ आ रही थी, छन-छन, बिना हाथ हिलाए। खिड़की के बाहर बरगद जैसा कोई पेड़ नहीं था। महेश्वर से घर तो बहुत दूर था, फिर भी उसी बरगद की गंध कमरे में उतर आई थी, गीली मिट्टी और सूखे फूल की। बुआजी का छोटा भाई तब हॉस्टल में पढ़ता था, इंदौर में, उसे फोन तक नहीं किया गया, बात यहीं तक रही घर में।

बुआजी ने पंडित जी को बुलाया। हनुमान चालीसा पढ़ी गई, घर में गंगाजल छिड़का गया। इससे फायदा हुआ या समय से हुआ, ये कोई नहीं जानता। पंद्रहवें दिन रीना की कलाई की तेरहवीं चूड़ी अपने आप टूट गई, बिना किसी आवाज़ के, सोते में। बाकी बारह वैसी की वैसी रहीं, ठंडी, आम, लाख की।

बुआजी ने वो टूटी चूड़ी फेंकी नहीं, न जाने क्यों। आज भी उनकी अलमारी के सबसे नीचे वाले खाने में एक पुराने कपड़े में लिपटी पड़ी है, आधा टुकड़ा काला, आधा लाल। और छूने पर, बुआजी कहती हैं, अब भी हल्की गरम लगती है।

"Looking up the network of branches of the banyan tree." by jdnx is licensed under CC BY 2.0. To view a copy of this license, visit https://creativecommons.org/licenses/by/2.0/.

No ratings yetSign in to rate

Replies0 replies

No one has dared to reply yet.

Only members can reply to this story.