मैं बर्तन माँज रही थी और तीसरी थाली अभी तक साबुन से भरी पड़ी थी, हाथ चल रहे थे पर दिमाग दरवाज़े पर अटका था। रात के साढ़े नौ बजे थे, खाना खत्म हुए बीस मिनट भी नहीं हुए थे — या शायद पंद्रह ही हुए थे, ठीक याद नहीं — और नल का पानी बेवजह देर तक बहता रहा क्योंकि मैं गिन रही थी। दो दस्तक, थोड़ा रुककर, फिर एक। भगवती चाची यही करती थीं। पिछले साल गुज़र गईं, टीबी वार्ड में, पर उनकी दस्तक का ये तरीका पूरे मोहल्ले में मशहूर था। दो-रुक-एक। कोई और ऐसे नहीं खटखटाता।
हमारे घर में दादी ने बरसों पहले कुछ नियम बना दिए थे। कागज़ पर नहीं, बस मुँह-ज़बानी, हर बच्चे को दस साल की उम्र तक याद हो जाते थे। अब हम सब मिलकर वो नियम याद करते हैं, हर बार जब ऐसी दस्तक सुनाई दे।
एक — रात के खाने के बाद कोई भी दरवाज़ा नहीं खोलेगा, चाहे कोई कितनी भी जानी-पहचानी आवाज़ में क्यों न बुलाए।
दो — अगर आवाज़ किसी ऐसे इंसान की लगे जिसे तुम पहचानते हो, तो पहले ये देखो कि वो इंसान अभी ज़िंदा है या नहीं। भगवती चाची की तरह।
तीन — दो दस्तक और एक दस्तक के बीच का फ़ासला हर बार बराबर होगा। अगर फ़ासला बदल जाए, गिनती रोक दो, आगे मत गिनो।
चार — कोई जवाब मत दो, चाहे वो नाम लेकर पुकारे। अगर तुम्हारा नाम सही तरीके से लिया गया हो, बिना बिगाड़े, तो समझ लो कि उसने वो नाम किसी और से सुना है, तुम्हारे मुँह से नहीं।
पाँच — अगर घर के अंदर से किसी ने पूछ लिया 'कौन है', तो दरवाज़ा अपने आप नहीं खुलेगा, पर आवाज़ ज़रा हल्की हो जाएगी। जैसे बाहर वाला मुस्कुरा रहा हो।
छह — [यहाँ से नियम याद नहीं। यहाँ से दादी हमेशा रुक जाती थीं, कहतीं बाद में बताऊँगी।]
सात — अगर नियम छह टूट गया हो, तो सुबह चौखट पर देखना, कुछ मत छूना, बस देखना।
आठ — अगर चौखट पर कुछ भी न मिले, तो समझ लो कल रात कोई सचमुच अंदर आया था और वापस अपने साथ कुछ ले गया।
मेरी छोटी बहन ने बर्तन का पानी बंद कर दिया। दो दस्तक। रुक। एक। हम दोनों दरवाज़े की तरफ़ नहीं देखीं, सिंक की टाइल्स गिनने लगीं, कितनी टूटी हुई हैं, कितनी सही। सात टूटी थीं, मुझे अभी भी याद है, हालाँकि किसी काम का नहीं ये गिनना।
बाहर से आवाज़ आई, बिल्कुल भगवती चाची जैसी, थोड़ी कर्कश, थोड़ी नरम। 'बेटा, दरवाज़ा खोलो ज़रा, चाय की पत्ती नहीं है मेरे पास।' भगवती चाची कभी रात को चाय की पत्ती नहीं माँगती थीं, वो सुबह-सुबह माँगती थीं, दूध वाले भैया के आने से पहले, जब वो दूध में मिलावट को लेकर उससे लड़ भी लेती थीं अक्सर। ये गलती किसी ने नोटिस नहीं की, सब बर्तन में डूबे थे, टाइल्स गिन रहे थे, साँस रोके थे।
दस्तक फिर हुई। इस बार फ़ासला वही था, एक बाल भी इधर-उधर नहीं। हमने आपस में देखा, किसी ने कुछ नहीं कहा। माँ ने चूल्हे की गैस बंद कर दी, बिना वजह, हाथ काँप रहे थे शायद, या शायद वो सिर्फ़ ठंडी हवा से थे, बाद में उन्होंने कहा याद नहीं।
सुबह हमने चौखट पर एक चप्पल देखी। सिर्फ एक, दायें पैर की, भगवती चाची की वही पुरानी हवाई चप्पल जिसे उनके बेटे ने श्मशान में जला दिया था। अंगूठे वाला पट्टा आधा कटा हुआ, धूल में औंधी पड़ी, तलवा ऊपर की तरफ़।