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HorrorGod

छतरपुर वाले प्रोफेसर साहब का रेडियो

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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पहले लगा नल टपक रहा है। हमारे यहाँ पुराने घरों में यही होता है, रात को सन्नाटा हो तो हर बूंद ड्रम पे ऐसे बजती है जैसे कोई टिक-टिक कर रहा हो। मैं लेटा हुआ मोबाइल में लगा था, सोचा उठकर टोंटी बंद कर आऊं, फिर आलस में रुक गया।

पर टपकने की आवाज़ में एक गैप था जो पानी की बूंद में नहीं होता। एक ठहराव, जैसे कोई सांस ले रहा हो बोलने से पहले।

तब समझ आया कि आवाज़ नल से नहीं, बगल वाले कमरे से आ रही है — प्रोफेसर धस्माना जी का पुराना ट्रांजिस्टर, जो अलमारी के ऊपर धूल खाए साल भर से पड़ा था। उसका डायल टूटा हुआ था, सुई हमेशा एक ही जगह अटकी रहती, यह मुझे कभी ठीक करवाना था और मैंने कभी करवाया नहीं।

मैं धस्माना जी का दूर का भांजा हूँ। उनका घर अभी बिका नहीं है इसलिए हफ्ते में एक-दो रात मैं यहीं रुक जाता हूँ, ताला-चाबी वालों की चोरी का डर रहता है वरना। धस्माना जी संस्कृत पढ़ाते थे, महाराजा कॉलेज में, रिटायर होने के बाद भी दो-तीन प्राइवेट स्टूडेंट को घर बुलाकर पढ़ाते रहे। दो साल पहले गुज़र गए — या तीन, ठीक याद नहीं, मौसी हर बार अलग बताती हैं — दिल का दौरा, आधी रात को, ठीक उसी कमरे में जहाँ रेडियो रखा है। यह मुझे बाद में पता चला। मौसी ने बताया था, फोन पर, उस दिन बीच में लाइन भी कट गई थी दो बार। तब मुझे इतना अजीब नहीं लगा था।

रेडियो का प्लग, मैं कसम खा सकता हूँ, सॉकेट में लगा ही नहीं था। मैंने खुद निकाला था शाम को — स्विच बोर्ड में शॉर्ट का डर था। धस्माना जी को बिजली की बड़ी सनक थी, हर चीज़ अनप्लग करके सोते थे, यह मौसी बताती थीं तो मैंने भी वही आदत अपना ली इस घर में। तो जब वो आवाज़ चली तो पहले लगा शायद अंदर की बैटरी से चल रहा है। फिर देखा बैटरी वाला ढक्कन ही टूटा हुआ पड़ा है, अंदर कुछ नहीं। खाली।

आवाज़ मर्दाना थी, बूढ़ी, थोड़ी नाक से बोलने वाली — बिल्कुल वैसी जैसी मौसी बताती थीं धस्माना जी की। वो कुछ पढ़ा रहे थे, संस्कृत के श्लोक जैसा कुछ, बीच-बीच में हिंदी में समझाते हुए, जैसे कोई क्लास चल रही हो जिसमें स्टूडेंट कोई नहीं है।

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