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HorrorGod

खंडवा की उस रात छत पर सात फेरे नहीं होने चाहिए थे

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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खंडवा शहर के एक पुराने मोहल्ले में बसा, जहाँ गर्मियों में बहू की चारपाई छत पर डालने की रीत आज भी निभाई जाती है।

हमने पहले ही रात को गिनती शुरू कर दी थी, पर तब तक हमें नहीं पता था कि किस चीज़ की गिनती हो रही है।

निशा की शादी को तीन महीने हुए थे, या शायद साढ़े तीन, अम्मा को ठीक याद नहीं रहता ऐसी बातें। गर्मी में कमरे का पंखा भी लू ही फेंकता था। अम्मा ने कहा, छत पर चारपाई डाल दो, नई बहू को हवा मिलेगी। यह रिवाज़ पुराना था। हमारे मोहल्ले के हर घर में बहू की चारपाई छत पर ही जाती है जून-जुलाई में। बस अम्मा ने एक बात बार-बार दोहराई, चारपाई हमेशा उसी जगह डालनी है जहाँ बाबूजी की दादी ने चूने की लकीर खींची थी, मुँडेर से बराबर तीन हाथ की दूरी पर। न एक इंच इधर, न उधर।

निशा को गर्मी में वो कोना घुटन भरा लगता था, हवा वहाँ रुक जाती थी। रात के करीब साढ़े दस बजे उसके पति राजू, हमारे भाई, ने चारपाई खींचकर बीचोबीच कर दी, जहाँ खुली हवा सीधे आती थी। अम्मा उस वक्त नीचे थीं, बर्तन धो रही थीं। उन्हें पता ही नहीं चला। पड़ोस के मोबाइल पर कोई गाना बज रहा था, वही पुराना वाला, अम्मा को जो पसंद है, पर हमें नाम याद नहीं आता।

हम सब नीचे आँगन में लेटे थे, तारे गिनते हुए, जब पहली बार आवाज़ आई। छन्न... छन्न... छन्न। पायल की, धीमी, जैसे कोई पंजों के बल चल रहा हो। हमने सोचा बगल की छत से आ रही होगी, शर्मा जी की बकरी बंधी रहती है वहाँ, घंटी बजती है। पर बकरी की घंटी एक सुर में बजती है। यह आवाज़ घूम रही थी, हमारे घर की छत के चारों तरफ, एक चक्कर पूरा करके फिर से शुरू।

हमने गिनना शुरू किया, बिना सोचे-समझे, जैसे कोई पुरानी आदत अचानक जाग गई हो। एक चक्कर। सन्नाटा। दो चक्कर। सन्नाटा, थोड़ा लंबा इस बार। तीसरे चक्कर के बाद अम्मा हाथ का पानी वहीं छोड़कर बाहर आ गईं। उनकी उंगलियों से अभी भी पानी टपक रहा था।

"चारपाई किसने खिसकाई?" उन्होंने पूछा। आवाज़ काँप रही थी।

राजू ने कुछ नहीं कहा, सीढ़ी की तरफ़ भागा। हम पीछे-पीछे भागे, पर अम्मा ने बीच में ही हाथ पकड़ लिया। "ऊपर मत जाना जब तक चक्कर पूरे न हो जाएँ। सात से पहले मत जाना।"

हमने पूछा क्यों सात। अम्मा ने बस इतना कहा कि दादी सा ने बताया था, चूने की लकीर उसे रोकती है, पर लकीर से बाहर रखी चारपाई, वो सात चक्कर पूरे करके अंदर आती है। उसके पैर, अगर कोई देख ले, उल्टे मुड़े होते हैं, एड़ी आगे, पंजे पीछे।

चौथा चक्कर। हमने राजू का हाथ मिट्टी में गीला महसूस किया। पसीने से नहीं। पाँचवाँ चक्कर, आवाज़ अब तेज़ थी, छन्न-छन्न-छन्न, जैसे कोई दौड़ रहा हो न कि चल रहा हो। छठे चक्कर के बाद अम्मा ने राजू का हाथ पकड़कर हनुमान चालीसा शुरू कर दी, ज़ोर से, बेसुरी आवाज़ में। हम सब साथ में गुनगुनाने लगे, सुर बिल्कुल गड़बड़, पर आवाज़ को दबाने के लिए वही काफ़ी था।

सातवाँ चक्कर शुरू हुआ। आधे में ही रुक गया। बीच में ही, जैसे किसी ने बीच का धागा काट दिया हो। सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि कान में सीटी बजने लगी, और दूर कहीं वही गाना अब भी बज रहा था, धीमा, बेपरवाह।

सुबह जब हम ऊपर गए, चारपाई अपनी पुरानी जगह पर वापस थी, ठीक चूने की लकीर के अंदर, तीन हाथ की दूरी पर, एकदम सीधी। निशा उस पर सोई थी, बेखबर, एक हाथ चेहरे पर रखे।

चारपाई की एक बाँह से एक पायल बंधी थी, मेहंदी लगे लाल धागे से। घुंघरू अभी भी हल्के-हल्के हिल रहे थे, हवा न होते हुए भी।

தஉழவன் (public domain)*

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