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HorrorGod

इमलीपुरा में तेरहवीं की उन्नीसवीं पत्तल

0 posts · Joined Aug 13, 2026

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मैं सुबह से पत्तल गिन रही थी, तेरहवीं के लिए, और तीन बार गिनती बिगाड़ चुकी थी। अठारह मेहमान थे, अठारह पत्तल, फिर भी मेरा हाथ हर बार उन्नीसवीं रख देता था अलग से, जैसे कोई और भी आने वाला हो। दिमाग असल में उस बात पर अटका था जो रुक्मणी मौसी ने कल रात बताई थी, बर्तन धोते हुए, नल से पानी टपकने की आवाज़ के बीच। एक बार मौसी ने बीच में ही पूछा कि साबुन कहाँ रखा है, फिर खुद ही ढूँढ लिया, बात वहीं से उठा ली जहाँ छोड़ी थी।

मौसी सागर के इमलीपुरा मोहल्ले में तीस साल से तेरहवीं का खाना बनाती हैं। पैंतीस भी कह सकते हैं, ठीक-ठीक याद नहीं उन्हें भी। कहती हैं वहाँ के पुराने घरों में एक ही नियम चलता है, उनकी सास ने बताया था, उनकी सास को उनकी सास ने। मैं मानती नहीं, पर सुनते वक़्त गले में कुछ अटक जाता है, और हाथ अपने आप उन्नीसवीं पत्तल की तरफ़ बढ़ जाता है।

नियम ये हैं, मौसी के शब्दों में। एक, तेरहवीं की गिनती में पत्तल हमेशा एक ज़्यादा लगाओ, चाहे मेहमान कितने भी हों। दो, वो ज़्यादा वाली पत्तल कोने में रखो, दरवाज़े के पास नहीं, दीवार से सटाकर। तीन, उसमें बाकी सबके जैसा ही खाना डालो, कम-ज़्यादा मत करना, वरना नाराज़ हो जाता है। चार, खाना खत्म होने के बाद वो पत्तल किसी को छूने मत देना, खुद उठाना। पाँच, अगर पत्तल आधी खाई मिले तो समझ लेना अभी शांति नहीं है, दुबारा तेरहवीं करानी पड़ेगी। छह, अगर पूरी खाई मिले, चाट कर, तो ही छुट्टी है उस साल के लिए। सात, कभी मत पूछना कि खाने वाला कौन है। नाम मत लेना। बस मत नाम लेना।

यहाँ से मौसी की आवाज़ बदल जाती थी, धीमी, जैसे बीड़ी की राख गिरा रही हों बोलते-बोलते।

आठ, अगर पत्तल गायब मिले, तो घर के किसी मर्द का नाम पुकारा जाएगा उस रात, एक बार, दरवाज़े के बाहर से। नौ, वो नाम असली आवाज़ में होगा, बिल्कुल जिसका बुलाया जाए उसकी माँ जैसी आवाज़ में, या भाई जैसी। दस, दरवाज़ा मत खोलना, चाहे कितनी भी सुनी-पहचानी लगे आवाज़।

मौसी यहाँ रुक गई थीं, गिलास हाथ में लिए। बोलीं कि ग्यारहवां नियम उन्हें ठीक से याद ही नहीं, क्योंकि जिस बार उन्हें भूलना पड़ा उस बार उनके देवर का लड़का उस रात दरवाज़ा खोल बैठा था, बस इतना देखने कि आवाज़ किसकी है।

ग्यारह, अगर कोई खोल दे तो जो बाहर खड़ा है वो अंदर नहीं आता। वो बस पूछता है, खाना मिला?

बारह... मौसी ने कहा बारह नियम था ही नहीं, ग्यारह के बाद सीधे तेरह आता है, क्योंकि उस साल के बाद उनके देवर के लड़के को कुछ याद नहीं रहा, अपना नाम भी दो दिन भूल गया था।

तेरह, जिस साल पत्तल चाटकर मिले, अगले तेरह साल तक उस घर में तेरहवीं दुबारा नहीं करनी पड़ती। बस इतना।

मैंने पूछा, मौसी, ये नियम शुरू किसने बनाए? वो हँस दीं। बोलीं वो तो उसी को पता है जिसे भूखा छोड़ा गया था, जिसका खाना किसी वजह से पूरा नहीं हो पाया इस दुनिया में, और अब वो हर तेरहवीं में गिनती में शामिल हो जाता है, चुपचाप, बिना बुलाए। मुझे उसी वक़्त याद आया कि हमारे घर के पिछवाड़े वाला कुत्ता, जो पिछले हफ़्ते से रात-रात भर भौंकता है, आज सुबह से चुप था। किसी ने ध्यान नहीं दिया।

आज सुबह मैंने अठारह पत्तल सही से लगाईं। कोने वाली उन्नीसवीं भी, दीवार से सटाकर, जैसा मौसी ने कहा था। शाम को जब सब खाकर चले गए, मैं बर्तन समेटने गई तो कोने वाली पत्तल वहाँ नहीं मिली जहाँ रखी थी। तीन फुट खिसकी हुई थी दरवाज़े की तरफ़। उस पर एक भी दाना चावल का नहीं बचा था, पत्तल इतनी साफ़ चाटी हुई थी कि उसकी हरी सतह चमक रही थी, जैसे अभी-अभी तोड़कर लाई गई हो।

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