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HorrorGod

चॉक का निशान

ghostsky-editorialसंपादक

0 पोस्ट · 13 अग॰ 2026 को शामिल हुए

पढ़ने में 3 मिनट81 बार देखा गया0 जवाब
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चतरपुर, मध्य प्रदेश के एक सरकारी हाई स्कूल हॉस्टल में सेट, जहाँ बोर्ड परीक्षाओं के दिनों की सुनी-सुनाई डरावनी बातें आज भी मोहल्लों में चलती हैं।

बारिश की आवाज़ थी, यही लगा था मुझे। छत पर टप-टप, हल्की, लगातार। बालकनी में गया तो आसमान साफ़ था, तारे तक दिख रहे थे उस रात। आवाज़ नीचे से आ रही थी, चाचा के घर की सीढ़ियों से — कोई चॉक की डिबिया हिला रहा था, वैसी ही टप-टप।

रामेश्वर चाचा बरामदे में मूंगफली छील रहे थे, रेडियो पर कोई पुराना गाना बज रहा था, शायद मन्ना डे था, ठीक याद नहीं। पूछा तो हँस दिए, "अरे बेटा, वो तो मेरी आदत है, डिबिया हिलाकर देखता हूँ कितनी बची है।" फिर बोले, "पर एक बार असली चॉक की आवाज़ ने मुझे रात भर जगाए रखा था। वो सुनाऊं?"

चाचा 1987 में, या शायद 88 था, ठीक साल याद नहीं आता अब उन्हें भी, चतरपुर के गवर्नमेंट हाई स्कूल हॉस्टल में दसवीं के इम्तिहान की तैयारी कर रहे थे। मार्च का महीना, गर्मी अभी शुरू ही हुई थी, बिजली रात में दो-तीन बार जाती थी। हॉस्टल के वार्डन मिश्रा जी बड़े सख़्त थे, पर एक बात हर साल दोहराते — इम्तिहान के दिनों में किसी के भी कमरे के दरवाज़े पर सफ़ेद चॉक का निशान दिखे तो उस कमरे में मत सोना।

"हम सब हँसते थे उनकी बात पर," चाचा ने कहा, मूंगफली का छिलका फेंकते हुए। "बोलते, बुड्ढे को डर लगता है अंधेरे से।" उनकी बगल में बैठा उनका कुत्ता, टॉमी, कान खड़े करके सुन रहा था, हालांकि उस बात से उसका कोई लेना-देना नहीं था।

पर उस साल गणित के पेपर से एक रात पहले सुधीर के कमरे के दरवाज़े पर सुबह एक टेढ़ा-मेढ़ा निशान मिला। सुधीर चाचा का दोस्त था। किसी ने बनाया नहीं था, कम से कम कोई मानने को तैयार नहीं था। वार्डन ने सुधीर को उस रात दूसरे कमरे में सुला दिया।

रात के करीब बारह बजे सुधीर के असली कमरे का दरवाज़ा खटखटाया गया। आवाज़ बिल्कुल सुधीर की माँ जैसी थी — "बेटा, दरवाज़ा खोल, तेरा टिफ़िन लाई हूँ।" कमरे में उस वक़्त कोई और लड़का सो रहा था, नाम था बंशी। बंशी उठा, दरवाज़े तक गया, फिर रुक गया।

उसने बाद में बताया कि आवाज़ बिल्कुल सही थी, पर दरवाज़े के नीचे से जो परछाई दिख रही थी उसके पैर उलटे नहीं थे। पैर थे ही नहीं। सिर्फ़ एक धुंधली सी लकीर फर्श पर हिल रही थी, जैसे कोई चीज़ खुद को खींच रही हो।

बंशी ने दरवाज़ा नहीं खोला। आवाज़ ने तीन बार पुकारा, हर बार थोड़ी और मीठी, थोड़ी और परिचित। आख़िरी बार तो उसने बंशी का वो घर का नाम ले लिया जो सिर्फ़ उसकी माँ जानती थी, वो नाम जो बंशी ने हॉस्टल में किसी को नहीं बताया था। सुबह जब मिश्रा जी ने दरवाज़ा खुलवाया तो अंदर की तरफ़, चौखट के ठीक भीतर, उसी सफ़ेद चॉक से एक और निशान बना मिला। जैसे कोई अंदर से बनाकर गया हो।

"उसके बाद हमने कभी नहीं पूछा वार्डन जी से चॉक वाली बात," चाचा बोले, मूंगफली का आख़िरी दाना मुँह में डालते हुए। "बस हर साल मार्च में दरवाज़े पर नज़र रखने लगे थे।"

मैंने पूछा, "सुधीर का क्या हुआ फिर?"

चाचा चुप हो गए। रेडियो पर गाना खत्म हो चुका था, सिर्फ़ हिस-हिस की आवाज़ आ रही थी। उन्होंने छिलकों का ढेर एक तरफ़ सरकाया, उठे, और अंदर चले गए। कुछ नहीं बोले। टॉमी उठकर उनके पीछे-पीछे चला गया।

मैं थोड़ी देर बैठा रहा, मूंगफली के छिलके गिनता रहा बेवजह। जाते वक़्त बरामदे की बत्ती जल गई, और तभी मैंने देखा — दरवाज़े की चौखट के भीतरी हिस्से पर, बिल्कुल नीचे, सफ़ेद चॉक की एक पुरानी, धुंधली लकीर अब भी बनी हुई थी।

"Flying Angel House, Victoria Dock Rd, London" by kitmasterbloke is licensed under CC BY 2.0. To view a copy of this license, visit https://creativecommons.org/licenses/by/2.0/.

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