नल टपक रहा है, पहले यही लगा। टप... टप... बीच-बीच में रुक कर, फिर दोबारा। मैं तीसरी क्लास के बच्चों की कॉपियाँ जाँच रही थी, शाम के ढाई बजे, स्कूल खाली हो चुका था। फिर आवाज़ तेज़ हुई। नल नहीं, साइकिल की घंटी थी। टिन-टिन-टिन, वही पुरानी वाली, जो अब कोई बच्चा नहीं बजाता क्योंकि सबके पास गियर वाली साइकिलें आ गई हैं। घंटी किसी काम की नहीं रही। मैं नई-नई आई हूँ यहाँ, सरकारी स्कूल, शिवपुरी के बाहरी इलाके में, जहाँ गली के आख़िर में एक पुराना पीपल है और उसके नीचे एक सूखा हुआ कुआँ, जाली से ढका हुआ। चौकीदार रामखिलावन ने पहले ही दिन कागज़ का एक टुकड़ा थमाया था, हाथ से लिखा, काला पड़ चुका। उसने तीन-चार बार दोहराया, पढ़ लो, फिर जला देना, रखना मत। बाद में पता चला उसकी बकरी भी गली के उस मोड़ तक नहीं जाती, भूखी मर जाए
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