
हमारे यहाँ एक ही नियम है, बाकी सब चलता है। सीट नंबर बत्तीस की टिकट कभी नहीं काटी जाती। चाहे बस खचाखच भरी हो, चाहे कोई खड़ा होकर पूरा रास्ता जाने को तैयार हो, रामलाल भैया उस सीट की तरफ़ इशारा भी नहीं करते। बस इतना कहते हैं, "वो बुक है।" किसकी बुक है, कब से बुक है, ये किसी ने नहीं पूछा। हमारा परिवार जैसा स्टाफ है — रामलाल भैया कंडक्टर, बिहारीलाल भैया ड्राइवर, और मैं, सोनू, सफाई और सामान का काम देखता हूँ। तीनों रात की गाड़ी में साथ रहते हैं, बैतूल से अमरावती, ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर डिपो से निकलती है। रामलाल भैया की एक आदत है, हर बात के आखिर में "समझे ना" जोड़ देते हैं, चाहे बात समझ में आए या न आए।
पहली बार जब मैंने ये देखा, बस स्टैंड की ट्यूबलाइट झिलमिला रही थी। वही वाली जो पिछले महीने से खराब है और अभी तक बदली नहीं गई, हर बार शिकायत करो तो बोलते हैं अगले हफ्ते आएगा बिजली वाला। एक औरत चढ़ी, हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में, बाल खुले हुए, अकेली। उसने सीधे बत्तीस नंबर की तरफ़ इशारा किया, "वहीं बैठूँगी।" रामलाल भैया ने बिना देखे कहा, "वो सीट नहीं मिलेगी, आगे वाली ले लो, पंद्रह नंबर खाली है, समझे ना।" औरत मुस्कुराई, कुछ बोली नहीं, पंद्रह नंबर पर बैठ गई। पूरे रास्ते खिड़की से बाहर देखती रही, एक बार भी पलक नहीं झपकाई ऐसा मुझे याद है, पर हो सकता है मैंने ठीक से देखा ही न हो, रात के उस पहर में नींद भारी हो जाती है। बहोरी बस स्टॉप पर उतर गई, किसी ने उसे दोबारा नहीं देखा। मुझे बस इतना याद रह गया कि उसकी चप्पल की आवाज़ नहीं आई थी सीट तक जाते वक़्त, फ़र्श लोहे का है, हर किसी की चप्पल बजती है वहाँ।
दूसरी बार यही सीन दोहराया। बस उस रात रामलाल भैया का भांजा, विशाल, साथ में था। कॉलेज से छुट्टी में घर आ रहा था, नींद में झूल रहा था, गलती से बत्तीस नंबर के पास वाली सीट, इकतीस, पर बैठ गया। ग्यारह चालीस पर वही औरत चढ़ी, वही गुलाबी साड़ी, बाल खुले। इस बार उसने बत्तीस नंबर नहीं माँगा। सीधे विशाल के बगल में, इकतीस के दूसरे कोने में बैठ गई, हालाँकि वहाँ पहले से कोई नहीं था, सीट खाली नहीं लगती थी फिर भी। रामलाल भैया ने उसे टिकट के लिए पूछा, उसने पैसे बढ़ाए। चिल्लर में एक पुराना पचास पैसे का सिक्का भी था, जो अब चलता ही नहीं, वो सिक्का रामलाल भैया ने जेब में रख लिया, बाद में मैंने देखा उनके पर्स में अब भी पड़ा है। टिकट काट दी, आदत से, ध्यान कहीं और था। विशाल पूरे रास्ते खिड़की की तरफ़ मुँह किए सोता रहा। बहोरी में औरत उतर गई।
विशाल घर पहुँचकर, उसे बुखार चढ़ गया। हाथ ठंडे पड़ गए थे, माँ ने बताया रात भर बड़बड़ाता रहा कुछ, समझ नहीं आया क्या। तीन दिन तक होश नहीं आया, फिर ठीक हो गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। किसी ने इसे संयोग कहा, किसी ने बस स्टैंड की गंदगी वाला बुखार बताया।
तीसरी बार, वही रात, वही बस स्टैंड, वही झिलमिलाती ट्यूबलाइट, अभी तक नहीं बदली गई। इस बार रामलाल भैया ने खुद देख लिया, औरत सीधे बत्तीस नंबर पर बैठ गई, बिना पूछे, बिना पैसे दिए। रामलाल भैया ने आदतन टिकट मशीन उठाई, नंबर डाला, बत्तीस। फिर हाथ रुक गया। याद आ गया। मशीन बंद कर दी, उंगलियाँ हल्का काँप रही थीं मशीन के बटन पर, मैंने देखा। औरत ने पलटकर देखा, मुस्कुराई, कुछ नहीं बोली। बहोरी में हमेशा की तरह उतर गई।
अगली सुबह मैं बस साफ़ करने गया। बत्तीस नंबर की सीट का कवर उलटा पड़ा था, जैसे किसी ने रात में उसे पीछे से घुमाकर बैठा दिया हो। सिलाई वाला हिस्सा ऊपर, धूल भरा तला बाहर की तरफ़।
RATHOD SRAVAN (public domain)