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HorrorGod

बरवानी मेले वाली मेहंदी

ghostsky-editorialसंपादक

0 पोस्ट · 13 अग॰ 2026 को शामिल हुए

पढ़ने में 1 मिनट9 बार देखा गया0 जवाब
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अरे रुक, यही तो मैं बता रही हूँ, सुन तो पूरी। हाँ वही मेहंदी वाली, कोने वाले स्टॉल की। याद है ना, जो पीपल के पास लगती थी हर साल मेले में, ठीक उसी पेड़ के नीचे जहां छोटू का चाचा हर साल गन्ने का जूस बेचता है।

तीन हफ्ते पहले की बात है, या शायद चार हफ्ते, ठीक याद नहीं। मैं और प्रिया दीदी बरवानी के मेले में गए थे, नर्मदा घाट वाले रास्ते से। मैंने दोनों हाथों पे मेहंदी लगवाई। बहुत बढ़िया मोर वाला डिज़ाइन बना रही थी वो औरत, उंगलियों से कोन ऐसे घुमा रही थी जैसे कढ़ाई कर रही हो। उसकी उंगलियां बहुत पतली थीं, नाखून बड़े थे। मुझे तब अजीब नहीं लगा, सच बताऊं तो मैंने ध्यान भी नहीं दिया, बस सोचा कि हाथ ठंडे हैं इसकी, शायद बर्फ छू के आई है।

रात को घर आके सो गई। सुबह जब हाथ धोने के लिए मेहंदी उतारी तो मोर वाला डिज़ाइन नहीं था। लकीरें थीं, टेढ़ी-मेढ़ी, जैसे किसी ने पंजों के निशान बनाए हों। कलाई से शुरू होकर कोहनी तक, और हर निशान उल्टा था। ऐसे जैसे कोई पीछे की तरफ चल के गया हो हाथ पे, एड़ी आगे और पंजा पीछे।

मैंने अम्मा को दिखाया। अम्मा ने कुछ नहीं कहा, बस साबुन से रगड़ के धुलवा दिया, चुपचाप। उनके हाथ कांप रहे थे थोड़ा, मैंने देखा, पर पूछने की हिम्मत नहीं हुई। उस रात दरवाज़े पे ताला दो बार लगाया, फिर तीसरी बार जाकर चेक भी किया।

अब आज की सुन। आज सुबह जब मैं दूध लेने गई तो मेला वाली गली में वही स्टॉल फिर लगा हुआ था, बीच हफ्ते में, जबकि मेला तो अगले महीने का था। वही औरत बैठी थी, वैसी ही साड़ी। पर इस बार उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दी, बोली—

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