
नियम यह है: रात की आख़िरी ट्रेन के बाद हम वेटिंग रूम की खिड़की वाली मेज़ पर एक थाली रख देते हैं। कभी चखी नहीं जाती, कभी पूछा नहीं जाता किसके लिए है। बस रख दो, ढँक दो, ताला लगाकर घर चले जाओ।
यह कटनी जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर एक का पुराना वेटिंग रूम है, अंग्रेज़ों के ज़माने का। छत पर वो पंखा आज भी लगा है जिसे रस्सी खींचकर चलाया जाता था, पंखा वाला पंखा, कपड़े का बड़ा फ्रेम जो ऊपर से लटकता है। बिजली गई तो गई, वो फ्रेम फिर भी हिलता है, कोई खींचे तो। हमारी दुकान चालीस साल से, या शायद बयालीस, ठीक याद नहीं, इसी रूम के बाहर लगती है, चाय-बिस्कुट का ठेला। नियम दादाजी के ज़माने से चला आ रहा है, हमने कभी सवाल नहीं किया। बगल वाले प्लेटफॉर्म पर जो कुत्ता रहता है, काना, एक आँख वाला, वो भी रात को उस तरफ़ से हट जाता है, पर उससे किसी का लेना-देना नहीं।
तीन हफ़्ते पहले पिंटू का दसवीं का रिज़ल्ट आया था, चौहत्तर प्रतिशत, पूरे मोहल्ले में मिठाई बँटी। उस रात वो ठेले पर हमारी जगह ड्यूटी करने बैठा, बड़ा खुश था, बोला मामा आज मैं बंद करूँगा। हमने कहा ठीक है, बस थाली रखना मत भूलना।
वो भूल गया। रिज़ल्ट की मिठाई खिलाने में, लोगों से बात करने में, थाली रखनी उसके ज़हन से उतर गई। रात करीब एक बजे उसने खुद बताया, हाथ काँप रहे थे, आवाज़ टूट रही थी, कि वेटिंग रूम की लाइट गई हुई थी, पूरा अंधेरा था स्टेशन में, फिर भी वो पंखा घूम रहा था। पूरी रफ़्तार से। पिंटू ने रस्सी की तरफ़ देखा, कोई नहीं था। रस्सी अपने आप ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे कोई भूखा आदमी हवा खा रहा हो।
आज रात हम फिर वहीं खड़े हैं। बिजली गई है, पूरे कटनी में। स्टेशन का जनरेटर भी आज बंद पड़ा है, किसी ने बताया मशीन में तेल नहीं भरा। हमने थाली रखी है, बासी नहीं, गरम-गरम दाल-चावल, आज ही बनाया। ढँककर मेज़ पर रख दिया, हमेशा की तरह। दरवाज़ा बंद करते वक़्त हमने देखा कि पंखा फिर घूमने लगा है, बिना बिजली के, बिना रस्सी खींचे। कमरे में कोई नहीं है, सिर्फ़ हम तीनों बाहर खड़े हैं, ताला हाथ में लिए, और किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही आगे बढ़ने की।
पिंटू ने वो रात बताई थी कि उसने रस्सी को हिलते देखा, पर ये नहीं बताया था कि हिलने की आवाज़ के साथ एक साँस भी सुनाई दी थी, लंबी, जैसे किसी ने बरसों बाद हवा खींची हो। दादाजी बताते थे कि यह वेटिंग रूम बनने के दौरान एक मज़दूर की भूख से मौत हुई थी। अंग्रेज़ ठेकेदार ने तीन दिन खाना नहीं दिया था, बस काम लिया था। उसकी लाश उसी छत के नीचे मिली थी, हाथ ऊपर उठे हुए, जैसे रस्सी पकड़ रखी हो।
हम ताला बंद कर देते हैं। पंखा अंदर घूमता रहता है, पूरी रफ़्तार से, अंधेरे में। बाहर से हम देख सकते हैं, खिड़की के काँच से, कि थाली पर रखा ढक्कन थोड़ा हिला हुआ है, एक तरफ़ से उठा हुआ, जैसे किसी ने अभी-अभी झाँककर देखा हो कि आज क्या रखा गया है।
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