
रात के पौने बारह बजे मुझे लगता है कोई सीटी बजा रहा है, दूर से, इंजन की सीटी जैसी। बैग कंधे पर टिकाकर मैं वेटिंग रूम के दरवाज़े तक जाता हूँ। प्लेटफ़ॉर्म पर कोई ट्रेन नहीं, कोई अनाउंसमेंट नहीं। फिर समझ आता है कि सीटी नहीं, पंखे की आवाज़ है। पुराना जीईसी पंखा, ब्लेड शायद टेढ़ी है, हर चक्कर पर हल्की सीटी छोड़ती है। दामोह जंक्शन का यह वेटिंग रूम है। दूसरी पैसेंजर के लिए मैं यहीं बैठा हूँ, गाड़ी सुबह पाँच बजे है, या शायद पाँच पंद्रह, मुझे ठीक से याद नहीं अब।
लोड-शेडिंग शुरू हो चुकी है। ट्यूबलाइट बुझी पड़ी है, बस एक मोमबत्ती जल रही है काउंटर पर। पंखा फिर भी घूम रहा है। मैं दो बार ऊपर देखता हूँ और मान लेता हूँ कि कहीं इनवर्टर छुपा होगा, स्टेशन मास्टर के कमरे में शायद।
सामने बेंच पर एक बुज़ुर्ग बैठे हैं, खाकी बंडी पहने, शायद रिटायर्ड रेलवे स्टाफ़। मेरी नज़र पंखे पर टिकी देखकर हँसते हैं। "चालू रहता है ये, बेटा, बत्ती जाए तो भी। कोई बिजली नहीं इसमें।"
मैं पूछता हूँ कैसे। वो सिगरेट सुलगाते हुए बताना शुरू करते हैं, और बीच-बीच में खाँसते भी हैं, जैसे बात करने से ज़्यादा साँस लेने में तकलीफ़ हो। तीस साल पहले यहाँ एक कुली था, नाम भूल गया वो, या शायद बताना ही नहीं चाहते। सामान ढोते-ढोते हार्ट अटैक से यहीं गिर पड़ा था, इसी वेटिंग रूम के फ़र्श पर। कोई पास नहीं था तब, स्टेशन मास्टर तक पहुँचने में घंटा भर लग गया था। "वो प्यासा मरा था, भूखा भी। ड्यूटी पर था, खाना नहीं खाया था उस दिन।" फिर रुककर, बीड़ी का धुआँ छोड़ते हुए, दोहराते हैं — "भूखा मरा था वो। भूखा।"
उनका कहना है उसकी आत्मा अब भी यहीं है, नुकसान नहीं करती, बस चाहती है कोई उसे खाना दे, पानी दे। जो कोई रात को अकेला बैठा हो और भूल जाए, टिफ़िन या पानी की बोतल खुली छोड़ दे, सुबह खाली मिलती है। "नमक-रोटी भी रख दो तो चल जाता है उसका," वो कहते हैं, जैसे किसी घर के मेहमान की बात हो रही हो, और थोड़ा हँस भी देते हैं, जैसे खुद इस बात पर भरोसा न हो। पंखा उसी की वजह से चलता है, कहते हैं, क्योंकि कुली जीते जी उसी पंखे के नीचे बैठकर हाँफता था, अब भी वहीं बैठा रहता है, हवा खाता रहता है, यही एक चीज़ जो उसे मिल पाई है।
मैं हँस देता हूँ, पूछता हूँ क्या उन्होंने कभी खुद देखा। वो जवाब नहीं देते। बीड़ी बुझाकर उठ जाते हैं, कहते हैं गाड़ी आने वाली है उनकी, चाय पीनी है प्लेटफ़ॉर्म पर। चले जाते हैं। जाते-जाते बंडी की जेब से एक छोटी डायरी गिरा देते हैं, शायद, या शायद वो सिर्फ मेरा वहम था, अंधेरे में ठीक से दिखा नहीं, और मैं उठाने भी नहीं जाता।
मैं अकेला रह जाता हूँ बेंच पर। पैरों के पास टिफ़िन रखा है, अम्मा ने बाँधा था, आलू के पराठे। भूख नहीं है, ढक्कन बंद ही रहने देता हूँ। सिर बेंच की पीठ पर टिका लेता हूँ, बैग को छाती से लगाए। कब आँख लग जाती है, पता नहीं चलता।
जब आँख खुलती है तब बत्ती वापस आ चुकी है। ट्यूबलाइट भन्भना रही है। पंखा अब भी उसी रफ़्तार से घूम रहा है, कोई फ़र्क नहीं, जैसे उसे बिजली आने-जाने से कोई मतलब ही न हो। टिफ़िन का ढक्कन फ़र्श पर खुला पड़ा है। दोनों पराठे गायब हैं। थाली में बस तेल के दाग बचे हैं, और उस पर एक अँगूठे का निशान, तेल में सना, बहुत गहरा, इतना साफ़ कि उसकी रेखाएँ तक दिख रही हैं।
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